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संपादकीयः अनियमितता के कोष

सहकारी संस्थाओं के गठन और उनके जरिए लेनदेन को बढ़ावा देने का नियम इस मकसद से बना था कि लघु बचत करने, दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले वित्तीय रूप से कमजोर किसानों, बुनकरों, हस्तशिल्प आदि के काम में लगे लोगों को आसान शर्तों पर वित्तीय मदद पहुंचाई और उन्हें बचत के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। मगर सहकारी संस्थाओं के गठन के शुरुआती दिनों में ही यह पोल खुल गई थी कि वे धीरे-धीरे भ्रष्टाचार के अड््डे बनते गए हैं।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण। फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने भरोसा दिलाया है कि वित्तीय अनियमितता करने वाले सहकारी बैंकों के खिलाफ कड़े कानून बनाए जाएंगे। इसके लिए एक समिति गठित की जाएगी, जिसमें भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर भी शामिल होंगे। अगर जरूरत पड़ी तो संसद के शीतकालीन सत्र में जरूरी विधायी संशोधन किए जाएंगे। दरअसल, पंजाब एवं महाराष्ट्र बैंक यानी पीएमसी नामक सहकारी बैंक में वित्तीय गड़बड़ियां पाई जाने और उस पर पाबंदी लगाई जाने के बाद लोगों में अपने धन की सुरक्षा को लेकर जो आशंकाएं पैदा हो गई हैं, उससे सहकारी संस्थाओं की साख को गहरा धक्का पहुंचा है। पीएमसी के खातों और उसके कारोबार की छानबीन के बाद मिली गड़बड़ियों के मद्देनजर सरकार के लिए भी ये संस्थाएं चिंता का सबब बन गई हैं। पीएमसी की महाराष्ट्र में करीब एक सौ बीस शाखाएं थीं। दूसरे राज्यों में भी उसका कारोबार फैला हुआ था।

वह तेजी से उभरता हुआ सहकारी बैंक था। बताया जा रहा है कि वह बैंकिंग की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए लाइसेंस पाने की फिराक में था। इसलिए उसने अपने खाता संबंधी ब्योरों में अपने कारोबारी मुनाफे को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया था। जबकि उसने जो कर्ज बांटे थे, उसमें से अधिकतर डूब चुके थे। इसी के मद्देनजर रिजर्व बैंक ने उस पर नकेल कसने का फैसला किया। हालांकि सरकार इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि पीएमसी के ग्राहकों का पैसा डूबने न पाए, पर चिंता इस बात की है कि ऐसे और कितने बैंकों की अनियमितता की परतें उघड़ेंगी।

सहकारी संस्थाओं के गठन और उनके जरिए लेनदेन को बढ़ावा देने का नियम इस मकसद से बना था कि लघु बचत करने, दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले वित्तीय रूप से कमजोर किसानों, बुनकरों, हस्तशिल्प आदि के काम में लगे लोगों को आसान शर्तों पर वित्तीय मदद पहुंचाई और उन्हें बचत के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। मगर सहकारी संस्थाओं के गठन के शुरुआती दिनों में ही यह पोल खुल गई थी कि वे धीरे-धीरे भ्रष्टाचार के अड्डे बनते गए हैं। किसानों, बुनकरों, छोटे उद्यमियों आदि को कम ब्याज दरों पर दिए जाने वाले कर्ज का लाभ ज्यादातर बड़े कारोबारी उठाने लगे और फिर वह धन बट्टेखाते में जाता रहा। जाहिर है, उसमें खाताधारकों और सहकारी बैंकों या समितियों के अधिकारियों की साठगांठ थी। इस तरह कई सहकारी समितियां बंद हो गईं। कई मामलों में काले धन को सफेद करने का जरिया भी ये संस्थाएं बनती रही हैं। नोटबंदी के समय के खुलासे इसके हाल के उदाहरण हैं। लिहाजा, सहकारी संस्थाओं पर कड़ी निगरानी की जरूरत लंबे समय से रेखांकित की जाती रही है।

अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में सहकारी संस्थाओं और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की कारगर भूमिका मानी जाती है। देश के बहुत सारे लोग, जो बड़े बैंकों से नहीं जुड़े होते या फिर बैंकों के पास बहुत छोटी रकम की वित्तीय सहायता जैसे खाद, बीज, सूत, मवेशी आदि खरीदने के लिए कर्ज देने का प्रावधान नहीं होता, वे इन सहकारी या फिर गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं की मदद से अपने कारोबार को आगे बढ़ाते रहे हैं। पर ये कुछ खिलाड़ी कारोबारियों या कालाधन जमा करने वालों के हाथ की कठपुतली बन जाएं और भारी पैमाने पर अनियमितता करने लगें, तो इन्हें गठित करने का मकसद ही कहीं खो जाता है। इसलिए केंद्रीय वित्त मंत्रालय की सहकारी संस्थाओं पर कड़ी नजर रखने और अनियमितता करने वालों के खिलाफ सख्ती बरतने का इरादा सराहनीय है।

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