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संपादकीयः हिंसा का चुनाव

बंगाल में सोमवार को पंचायत चुनाव के लिए मतदान का दिन था। इस दिन राज्य में जो व्यापक हिंसा हुई वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है।

Author May 15, 2018 03:48 am
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (फाइल फोटो)

बंगाल में सोमवार को पंचायत चुनाव के लिए मतदान का दिन था। इस दिन राज्य में जो व्यापक हिंसा हुई वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है। इस हिंसा में दस लोगों की जान चली गई। सैकड़ों लोग घायल हुए हैं। बूथकब्जे, आगजनी, बम फेंके जाने, धमकी देने और मारपीट की कितनी घटनाएं हुर्इं इसका पूरा हिसाब दे पाना फिलहाल मुश्किल है। चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष, बिना किसी भय या दबाव के होने चाहिए। लेकिन इनमें से किसी भी कसौटी पर ये चुनाव खरे नहीं उतरते। यही नहीं, ये चुनाव कानून-व्यवस्था की नाकामी भी बयान करते हैं। क्या यह वही ‘पोरिबर्तन’ है जिसका वादा करके ममता बनर्जी सत्ता में आई थीं?

विपक्ष में रहते हुए ममता बनर्जी वामपंथी शासन पर गुंडागर्दी को संरक्षण देने और चुनाव को हिंसा से प्रभावित करने का आरोप लगाते नहीं थकती थीं। लेकिन अब क्या हो रहा है? हिंसा की ताजा घटनाओं पर माकपा, कांग्रेस और भाजपा यानी विपक्ष की सभी पार्टियों ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए इसे तृणमूल का आतंक करार दिया है। इसके पलटवार में तृणमूल ने कहा है कि पंचायत चुनाव में हिंसा की घटनाएं पहले भी होती थीं, बल्कि वाममोर्चे के राज में इससे भी ज्यादा हुई थीं। लेकिन क्या पहले के आंकड़ों का हवाला देकर राज्य सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ सकती हैं? यह सही है कि बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा लंबे समय से होती आ रही है। जिस पार्टी की सरकार होती है वह विपक्ष के कार्यकर्ताओं को डराने-धमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ती।

तृणमूल कांग्रेस ने दशकों से चले आ रहे इस सिलसिले को रोकने के बजाय इसे कितने उग्र रूप में अपना लिया है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पार्टी ने चौंतीस फीसद सीटें पहले ही ‘निर्विरोध’ जीत लीं। जबकि विपक्षी दलों का कहना है कि उनके बहुत-से उम्मीदवारों को परचा दाखिल नहीं करने दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने ‘निर्विरोध’ रही सीटों के नतीजे घोषित करने पर रोक लगा दी है। हो सकता है न्यायालय हिंसा की घटनाओं का भी संज्ञान ले। लेकिन सवाल है कि बंगाल में लोकतंत्र हिंसा के साए से बाहर कैसे आए? इस संदर्भ में पहली बात तो यह है कि फौरन राज्य भर में अवैध हथियारों की जब्ती का अभियान चले। दूसरी बात, बंगाल उन राज्यों में है जहां पुलिस का सबसे ज्यादा राजनीतिकरण हुआ है; इसके चलते पुलिस सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी रोकने में रुचि नहीं लेती, बल्कि अकसर खामोश रहती है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि सत्ता परिवर्तन होते ही, या उसके आसार दिखने पर, बड़े पैमाने पर दलबदल होता है और इसमें असामाजिक तत्त्वों की भरमार रहती है। राजनीतिक हिंसा के मद्देनजर भी पुलिस सुधार एक अनिवार्य तकाजा है।

पुलिस सुधार के लिए बनी सोली सोराबजी समिति ने पुलिस को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त करने और उसकी निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए कई अहम सिफारिशें की थीं। सर्वोच्च अदालत की बार-बार की हिदायत के बावजूद राज्य सरकारों की अनिच्छा के कारण वे सिफारिशें लागू नहीं हो पार्इं, पर उन्हें लागू किए जाने की मांग उठनी चाहिए। बंगाल में ‘इलाका दखल’ करने और दूसरों को अपने इलाके में पैर न टिकाने देने और इसके लिए किसी भी हद तक जाने की जो राजनीतिक संस्कृति जड़ों जमाए हुए है वह सारी पार्टियों के व्यवहार में दिखती रही है, पर यह घोर अलोकतांत्रिक है। बंगाल को राजनीतिक हिंसा से निजात दिलानी है, तो यह केवल प्रशासनिक उपायों से नहीं होगा, पार्टियों को भी असामाजिक तत्त्वों से खुद को दूर रखने जैसे आत्म-सुधार के कुछ संकल्प लेने होंगे।

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