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संपादकीयः पहला साल

जीएसटी को लागू हुए एक साल हो गया। इसके साल भर के अनुभवों का जायजा लिया जाना और आकलन होना स्वाभाविक है। लेकिन जब सरकार चुनावी साल में प्रवेश कर चुकी हो, तो श्रेय लूटने का लोभ कैसे छोड़ सकती है।

Author July 3, 2018 3:44 AM
जीएसटी से अप्रत्यक्ष कर-संग्रह का दायरा भी बढ़ा है। लाखों नए करदाता बने हैं। लेकिन केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली का यह दावा पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता कि जीएसटी का क्रियान्वयन सबसे कम बाधाकारी रहा है।

जीएसटी को लागू हुए एक साल हो गया। इसके साल भर के अनुभवों का जायजा लिया जाना और आकलन होना स्वाभाविक है। लेकिन जब सरकार चुनावी साल में प्रवेश कर चुकी हो, तो श्रेय लूटने का लोभ कैसे छोड़ सकती है। सो, रविवार को ‘जीएसटी दिवस’ के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा कई केंद्रीय मंत्रियों ने भी जीएसटी के गुण गाए और इसे एक बार फिर ऐतिहासिक कदम बताया। जीएसटी की दिशा में पहल यूपीए सरकार के समय ही हो गई थी। पर तब भाजपा को यह कर प्रणाली अलोकतांत्रिक और राज्यों के अधिकारों का हनन करने वाली लगती थी; तब के मुख्यमंत्रियों में जीएसटी के खिलाफ सबसे तीखे बयान नरेंद्र मोदी के ही थे! अब वे जीएसटी को एक युगांतरकारी कदम बता रहे हैं और यूपीए सरकार में वित्तमंत्री रहे पी चिदंबरम मौजूदा जीएसटी की खामियां गिना रहे हैं! मोदी का कहना है कि जीएसटी से सरलता और पारदर्शिता आई है, और विकास को मजबूती मिली है। यह सही है कि जीएसटी ने बहुत सारे अप्रत्यक्ष करों को एक कर दिया और इस मायने में इसने बहुत सारी जटिलताएं खत्म की हैं।

जीएसटी से अप्रत्यक्ष कर-संग्रह का दायरा भी बढ़ा है। लाखों नए करदाता बने हैं। लेकिन केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली का यह दावा पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता कि जीएसटी का क्रियान्वयन सबसे कम बाधाकारी रहा है। शुरू के महीनों को याद करें, तो सरकार के बार-बार बदलते फैसलों से ही अड़चनें जाहिर थीं। दरों में बार-बार बदलाव किए गए, बार-बार अधिसूचनाएं जारी की गर्इं, और इस सब को लेकर काफी समय तक ढेर सारी गफलत बनी रही। शुरुआती दौर में आए दिन नए-नए फरमानों से इस आरोप को बल मिला कि जीएसटी को पर्याप्त तैयारी के बगैर, जल्दबाजी में लागू किया गया। इसकी डिजाइन पर भी सवाल उठते रहे हैं। छोटे व्यापारियों के लिए नियमों को समझना और उनका अनुपालन करना आसान नहीं रहा; कर चुकाना भी उनके लिए खर्चीला हो गया। प्रधानमंत्री के इस तर्क को खारिज नहीं किया जा सकता कि भारत जैसे देश में लग्जरी कार और खाने-पीने की चीजों पर समान कर नहीं हो सकता। लेकिन कर की चार दरों और कई सारे उप-करों के चलते, जीएसटी के जितना सरल होने की उम्मीद की गई थी वह पूरी नहीं हो पाई। प्रधानमंत्री ने जीएसटी के क्रियान्वयन के लिए राज्यों के प्रति आभार जताया है।

यह सही है कि जीएसटी को अमल की मंजिल तक पहुंचने में सबसे बड़ी चुनौती राज्यों को राजी करने की थी, क्योंकि अधिकतर राज्यों को आशंका थी कि जीएसटी के चलते अपने तर्इं अलग से संसाधन जुटाने में वे सक्षम नहीं रह पाएंगे। इस अंदेशे को दूर करने के लिए राज्यों को जीएसटी परिषद में पर्याप्त अधिकार देने और नुकसान होने पर भरपाई का भरोसा दिलाना पड़ा। यही नहीं, राज्यों के दबाव पर पेट्रोलियम और शराब जैसे राजस्व के दो प्रमुख मदों को जीएसटी से बाहर रखना पड़ा। इस तरह, जो जीएसटी लागू हुआ वह शुरुआती परिकल्पना से कई मायनों में भिन्न हो गया। एक समय वैट को लागू करने में भी दिक्कतें आई थीं। जीएसटी का क्रियान्वयन भी निर्बाध नहीं रहा। जीएसटी से अर्थव्यवस्था को अधिक संगठित रूप मिलने की उम्मीद बांधी गई है, पर केवल कॉरपोरेट के मद्देनजर नहीं, इस दृष्टि से भी आकलन होना चाहिए कि लघु उद्यमों और छोटे व्यवसायों पर इसका कैसा असर पड़ा। पहले साल में, कुल मिलाकर, जीएसटी का अनुभव मिलाजुला रहा है।

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