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संपादकीयः साझी चिंता

पिछले सप्ताह विश्वभारती विश्वविद्यालय का उनचासवां दीक्षांत समारोह हालांकि राजनीतिक या कूटनीतिक बातचीत का मौका नहीं था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की मुलाकात थोड़ी-बहुत द्विपक्षीय वार्ता का भी जरिया बन गई, जो कि स्वाभाविक है।

Author May 28, 2018 5:20 AM

पिछले सप्ताह विश्वभारती विश्वविद्यालय का उनचासवां दीक्षांत समारोह हालांकि राजनीतिक या कूटनीतिक बातचीत का मौका नहीं था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की मुलाकात थोड़ी-बहुत द्विपक्षीय वार्ता का भी जरिया बन गई, जो कि स्वाभाविक है। बांग्लादेश से भारत के रिश्ते यों तो अमूमन दोस्ताना रहे हैं, पर खटास के भी दौर आए हैं। ऐसा खासकर तब हुआ है जब वहां खालिदा जिया की सरकार रही। जबकि शेख हसीना के सत्ता में रहते बांग्लादेश और भारत के आपसी संबंध बेहतर रहे हैं। अवामी लीग की सरकार के ही सहयोग से भारत पूर्वोत्तर खासकर असम की उग्रवादी हिंसा पर काबू पा सका। उल्फा के हथियारबंद धड़े के कई कार्यकर्ताओं ने बांग्लादेश की सीमा में अपने अड्डे बना रखे थे। उनके खिलाफ शेख हसीना सरकार की कार्रवाई और फिर दोनों देशों के साझा अभियान ने उल्फा के आतंकवाद की कमर तोड़ दी। पर आपसी रिश्तों में तमाम प्रगति के बावजूद दोनों मुल्कों के बीच कुछ लंबित मसले और विवाद भी रहे हैं। इन्हीं में एक है तीस्ता जल विवाद। मोदी और हसीना की ताजा मुलाकात में भी इस पर चर्चा हुई, पर ऐसे मुद्दों पर किसी भी बातचीत की सार्थक परिणति तभी हो सकती है जब पहले विशेषज्ञ स्तर की बातचीत हो, उनके सुझाव और सिफारिशें आ जाएं, एक-एक पहलू पर दोनों पक्ष विस्तार से गौर कर लें और सहमति की संभावनाएं तलाश लें। यह मौका ऐसा नहीं था।

दोनों नेताओं की करीब आधे घंटे की बातचीत में दूसरा अहम मुद्दा था, रोहिंग्या शरणार्थियों की वापसी का। बांग्लादेश में कई लाख रोहिंग्या रह रहे हैं। रोहिंग्या शरणार्थियों को पनाह देने के मुद्दे पर वहां भारत की तरह कोई विवाद तो नहीं उठा, पर अब बांग्लादेश भी चाहता है कि वे अपने मूल देश लौट जाएं। यह तभी हो सकता है जब म्यांमा इसके लिए राजी हो। शेख हसीना इसी में मोदी की मदद चाहती हैं। वे चाहती हैं कि भारत रोहिंग्या शरणार्थियों की वापसी के लिए म्यांमा पर दबाव डाले। विदेशमंत्री सुषमा स्वराज अपने म्यांमा दौरे में पहले ही यह मसला उठा चुकी हैं। जाहिर है, इस मामले में भारत और बांग्लादेश की इच्छा या चिंता समान है। बहुत-से लोगों की यह धारणा है कि म्यांमा में फौज के दमन का शिकार केवल रोहिंग्या लोगों को होना पड़ा है। यह सच नहीं है। कई जनजातीय समुदाय भी फौज के दमन के शिकार हुए हैं। इसलिए रोहिंग्या मामले को मजहबी चश्मे से नहीं, एक मानवीय संकट के तौर पर देखा जाना चाहिए।

आंग सान सू की की रिहाई और एक सीमा तक राजनीतिक अधिकारों की बहाली से यह उम्मीद की गई थी कि म्यांमा अब लोकतंत्र के रास्ते पर चलेगा। लेकिन लोकतंत्र का मतलब बस किसी तरह चुनाव हो जाना भर नहीं है। अगर कमजोर समूहों का उत्पीड़न होता रहे, तो उसे लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं कह सकते। म्यांमा में आज भी वही होता है जो फौज चाहती है। जिस तरह एक समय अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सू की की रिहाई और राजनीतिक सुधार के लिए म्यांमा के फौजी निजाम पर दबाव डाला था, उसी तरह डर के मारे पलायन किए हुए रोहिंग्या लोगों की सुरक्षित वापसी को संभव बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र को प्रभावी पहल करनी चाहिए। भारत और बांग्लादेश संयुक्त रूप से जोर-शोर से इस मामले को अंतरराष्ट्रीय पटल पर उठाएं तो इसके लिए उपयुक्त माहौल बन सकता है।

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