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संपादकीयः रक्षा पर खर्च

संसदीय समिति की यह चिंता वाकई गौर करने लायक है कि रक्षा तैयारियों के मामले में भारत की स्थिति अच्छी नहीं है। इसमें हम पिछड़ रहे हैं। समिति ने इस पर हैरानी जताई कि सशस्त्र बलों के लिए जितना बजट होना चाहिए, उतना है नहीं।

Author Published on: May 24, 2018 3:48 AM
Photo-Indian Defence Forum

संसदीय समिति की यह चिंता वाकई गौर करने लायक है कि रक्षा तैयारियों के मामले में भारत की स्थिति अच्छी नहीं है। इसमें हम पिछड़ रहे हैं। समिति ने इस पर हैरानी जताई कि सशस्त्र बलों के लिए जितना बजट होना चाहिए, उतना है नहीं। चौंकाने वाली तो यह है कि 1962 के बाद यानी पिछले पचपन साल में यह पहला मौका है जब भारत का रक्षा बजट सबसे कम रखा गया है और वह भी तब जब भारत को पाकिस्तान और चीन जैसे देशों से चुनौतियां मिल रही हैं। इसका असर भारत की रक्षा तैयारियों पर पड़ रहा है। समिति ने कहा है कि हथियारों की कमी से निपटने के लिए साल भर पहले जो रणनीतिक भागीदारी मॉडल पर काम करने का फैसला हुआ था, उस पर भी कोई कदम नहीं उठाया गया। संसदीय समिति की ये टिप्पणियां काफी गंभीर हैं और इस बात की ओर इशारा करती हैं कि रक्षा तैयारियों के मामले में हम पिछड़ रहे हैं।

स्वदेश में हथियार निर्माण को बढ़ावा देने के मकसद से पिछले साल रणनीतिक भागीदारी मॉडल की अवधारणा लाई गई थी। इसके तहत हथियार निर्माण के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की कंपनियों को बड़ी वैश्विक रक्षा कंपनियों के साथ भागीदारी कर यह काम शुरू करना था। पर इस दिशा में जिस गति से प्रगति की कल्पना की गई थी, उसमें जरा भी कामयाबी हासिल नहीं हुई है। ऐसे में सवाल उठता है कि स्वदेशी हथियार निर्माण का काम कैसे परवान चढ़ पाएगा। तेरहवीं रक्षा योजना (2017-22) में देश की तीनों सेनाओं को करीब सत्ताईस लाख करोड़ रुपए की जरूरत बताई गई है, यानी हर साल के लिए पांच लाख करोड़ रुपए। यह पैसा सेना के आधुनिकीकरण, नए हथियारों की खरीद और स्वदेश में हथियार निर्माण पर खर्च किया जाना है। पांच लाख करोड़ की यह रकम अभी तक हर साल किए जाने वाले खर्च की तुलना में काफी ज्यादा है। जब सरकार रक्षा बजट बढ़ा पाने की स्थिति में नहीं है तो सेना के आधुनिकीकरण के लिए पांच लाख करोड़ रुपए हर साल कहां से लाएगी। इसका हल किसी के पास नजर नहीं आ रहा। सेना की सवा सौ परियोजनाओं के लिए उनतीस हजार करोड़ रुपए की जरूरत है। मेक इन इंडिया इनिशिएटिव के तहत पच्चीस परियोजनाएं हैं, लेकिन उन पर काम करने के लिए पैसा नहीं है। देश की सुरक्षा को लेकर सरकार कितनी गंभीर है, यह इससे पता चलता है।

ऐसा नहीं कि हथियारों की कमी और रक्षा बजट में कमी की बात पहली बार हो रही हो। समय-समय पर संसदीय समितियां और भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) इस बारे में आगाह करते रहे हैं। लेकिन लगता है हमारे नीति-निर्माताओं के लिए यह मुद्दा प्राथमिकता में नहीं है। रक्षा मामलों पर संसद की स्थायी समिति सेना में हथियारों की कमी पर चिंता जता चुकी है। सेना के अड़सठ फीसद हथियार और उपकरण अब संग्रहालय में रखने लायक हो चुके हैं। केवल चौबीस फीसद साजो-समान इस्तेमाल करने लायक है। मात्र आठ फीसद ऐसे हथियार और उपकरण हैं, जिन्हें पूरी तरह से अत्याधुनिक कहा जा सकता है। जाहिर है, जरूरत के हिसाब से सेना को जितना बजट मिलना चाहिए वह नहीं मिल रहा है। अगर सेना का खजाना खाली रहेगा और पुराने, घिसे-पिटे हथियारों से हमारे जवान सीमाओं पर मोर्चे लेते रहेंगे तो कैसे देश सुरक्षित रहेगा, यह सरकार को सोचना चाहिए।

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