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संपादकीयः आत्महत्या बनाम मोक्ष

राजधानी दिल्ली में एक परिवार के ग्यारह सदस्यों की सामूहिक मौत की घटना स्तब्ध करने वाली है। यह हत्या का मामला है या आत्महत्या का, यह तो विस्तृत जांच के बाद ही पता चलेगा।

Author July 3, 2018 4:41 AM
इस घटना से पता चलता है कि इक्कीसवीं सदी में भी भारतीय समाज का एक हिस्सा कितना कुंद और कूपमंडूप हुआ पड़ा है, जहां धर्म-आस्था जानलेवा रूप में कायम हैं।

राजधानी दिल्ली में एक परिवार के ग्यारह सदस्यों की सामूहिक मौत की घटना स्तब्ध करने वाली है। यह हत्या का मामला है या आत्महत्या का, यह तो विस्तृत जांच के बाद ही पता चलेगा। जांच से शायद यह बात भी सामने आए कि किस तथाकथित गुरु या तांत्रिक के प्रभाव में इस परिवार ने ऐसा त्रासद कदम उठाया। लेकिन शुरुआती संकेत सामूहिक आत्महत्या की ओर इशारा कर रहे हैं। चार शवों के पोस्टमार्टम से भी आत्महत्या की बात ही सामने आई है। जैसा कि कहा जा रहा है, सभी ने इस तरह का कदम मोक्ष प्राप्ति के लिए उठाया। इसी अंधविश्वास में सतहत्तर साल की वृद्धा से लेकर बारह-पंद्रह साल के बच्चों तक ने मौत को गले लगा लिया। देश में इस तरह की शायद यह पहली घटना है।

उस पूरे परिवार की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो कई सवाल खड़े होते हैं। हैरानी की बात है कि यह घटना एक ऐसे परिवार में हुई जहां सब लोग मिलनसार और सहयोगी प्रवृत्ति के थे, आस-पड़ोस का सुख-दुख बांटने वाले थे। परिवार की एक बेटी ने विज्ञान में स्नातकोत्तर किया था और बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रही थी। फिर, आत्महत्या को कैसे मोक्ष प्राप्ति का रास्ता मान लिया? ऐसा भी नहीं हो सकता है कि इस तरह का कदम उठाने का फैसला अचानक किया होगा। घटना से स्पष्ट है कि इसे अंजाम देने की मानसिक तैयारी कई दिनों तक चली होगी। इससे पता चलता है कि हमारे समाज में दिमागी रुग्णता बढ़ रही है। कुछ साल पहले एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान एक लड़के ने अपनी मां को डंडे से इसलिए पीट-पीट कर मार डाला था कि उसे मां में हनुमान आते दिख रहे थे। अंधविश्वास के चलते, या उसकी आड़ में बलि देने की भी घटनाएं हो जाती हैं।

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इसलिए सवाल उठता है कि हम किस धर्म के पीछे भाग रहे हैं, धर्म को कैसा बना रहे हैं जो जान ले रहा है, समाज को रोगी बना रहा है। अभी तक कोई ऐसा तथ्य सामने नहीं आया है जिससे लगे कि यह परिवार किसी गंभीर आर्थिक संकट या अन्य किसी मुश्किल में रहा होगा। अगर घर-परिवार के एक या दो लोग किसी संकट या मानसिक तनाव में होते भी, तो बाकी लोग तो उन्हें समझाते। आखिर ऐसा क्या हुआ कि सभी ने जीवन खत्म करना ही बेहतर समझा? जाहिर है, सब लोग एक-सी मनोदशा के शिकार थे। एक पूरे परिवार के खात्मे की यह घटना, उस बीमार समाज की ओर भी इशारा करती है, जिसमें लोगों के लिए रिश्ते और भावनाएं खत्म हो गए हैं। वरना निश्चित ही आस-पड़ोस का कोई तो ऐसा होता जो इस परिवार की ऐसी अनहोनी के बारे में भांप पाता।

इस घटना से पता चलता है कि इक्कीसवीं सदी में भी भारतीय समाज का एक हिस्सा कितना कुंद और कूपमंडूप हुआ पड़ा है, जहां धर्म-आस्था जानलेवा रूप में कायम हैं। अधिसंख्य लोग तार्किक ढंग से सोच नहीं पाते हैं, गलत-सही तथा करणीय-अकरणीय का विवेक खो बैठते हैं। समाज में आ रहा बिखराव इसकी बड़ी वजह है। भारतीय समाज को सहेज कर रखने वाली हमारी व्यवस्थाएं तार-तार हो चुकी हैं और उनकी जगह ऐसे छद्म धर्म-व्यवहार ने ले ली है जो ठग रहा है, जान ले रहा है। इसीलिए करोड़ों लोग ढोंगी बाबाओं के शिकार बनते जा रहे हैं। ऐसे में, यह एक गंभीर चुनौती है कि लोगों को कैसे तर्कशील और विवेकवान बनाया जाए।

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