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संपादकीयः नतीजों की कसौटी

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की दसवीं परीक्षा के नतीजों की घोषणा के साथ ही फिर सबका ध्यान इस बात पर केंद्रित हो गया कि अव्वल कौन रहा! गौरतलब है कि सीबीएसई के नतीजों में इस साल लगभग सत्तासी फीसद विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए।

Author May 31, 2018 4:38 AM
सीबीएसई परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास होने पर विक्ट्री पोज़ देतीं छात्राएं। (एक्सप्रेस फोटो)

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की दसवीं परीक्षा के नतीजों की घोषणा के साथ ही फिर सबका ध्यान इस बात पर केंद्रित हो गया कि अव्वल कौन रहा! गौरतलब है कि सीबीएसई के नतीजों में इस साल लगभग सत्तासी फीसद विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए। यह आंकड़ा पिछले साल के मुकाबले करीब पांच फीसद कम है। यानी अगर नतीजों को ही मानक मानें तो बहुत सारे विद्यार्थियों की पढ़ाई की गुणवत्ता में गिरावट दर्ज हुई है। माना जा रहा है कि इस साल नतीजों में गिरावट की वजह परीक्षा के प्रारूप में बदलाव है, जिसके तहत सीसीई यानी निरंतर एवं व्यापक मूल्यांकन प्रणाली को इस बार लागू नहीं किया गया था। पर सवाल है कि क्या परीक्षाओं में ज्यादा से ज्यादा नंबर लाना ही बेहतर नतीजों का पैमाना होना चाहिए? विडंबना है कि इस सवाल के बरक्स विकसित हुई व्यवस्था में लोगों के बीच यह धारणा बनी है कि अगर उनके बच्चों को अच्छे नंबर नहीं मिले, तो उन्हें बेहतर भविष्य की दौड़ से बाहर मान लिया जाएगा। इस सोच का प्रत्यक्ष फायदा यह दिख रहा है कि बच्चों ने पढ़ाई-लिखाई पर खुद को केंद्रित किया और परीक्षाओं में काफी अच्छे नंबर हासिल कर रहे हैं। मगर इसका दूसरा पहलू चिंताजनक है।

यों पिछले साल की अपेक्षा नतीजों के प्रतिशत में कमी के बावजूद विद्यार्थियों की कुल कामयाबी पर खुश हुआ जा सकता है। पर एक कड़वी हकीकत यह भी है कि नतीजों की घोषणा के बाद तीन विद्यार्थियों के खुदकुशी कर लेने की खबरें आर्इं। वजह सिर्फ यह थी कि इन बच्चों को लगभग सत्तर या साठ फीसद अंक हासिल हुए थे। जान गंवाने वाली एक बच्ची की फिक्र यह थी कि अब वह विज्ञान विषय से पढ़ाई नहीं कर पाएगी और एक बच्चे को कम नंबर की वजह से उसके अभिभावकों ने फटकार लगाई। सवाल है कि यह कौन-सी व्यवस्था बनती गई है कि परीक्षा में नब्बे फीसद से अधिक नंबर न ला पाने पर बच्चों को कमतर मान लिया जाता है? यह कैसी मानसिकता है कि ज्यादा नंबरों को अभिभावकों ने अपनी प्रतिष्ठा का पर्याय बना लिया है और उसे बच्चों के जीवन के मुकाबले ज्यादा अहम मान लिया गया है? जबकि दुनिया भर में ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि पढ़ाई में सामान्य उपलब्धि वाले बहुत सारे बच्चों ने ज्यादा नंबर पाने वालों के मुकाबले दूसरे क्षेत्रों में ऊंचे मुकाम हासिल किए या बेहतर इंसान के रूप में मशहूर हुए।

दरअसल, हमारे यहां परीक्षा में नंबरों की अहमियत इसलिए भी है कि ज्यादा नंबर लाने वाले विद्यार्थियों को बेहतर कॉलेजों में दाखिला मिलता है और कम नंबर वाले बच्चों को कमतर कहे जाने वाले कॉलेजों में किसी तरह जगह मिल पाती है। जरूरत इस बात की है कि सभी स्कूल और कॉलेजों में गुणवत्ता आधारित शिक्षा के स्तर को एक समान बनाया जाए, ताकि पढ़ाई-लिखाई विद्यार्थियों के लिए सहज जीवन का हिस्सा हो। स्कूल-कॉलेजों की शिक्षा उनके भीतर मौजूद योग्यता या क्षमता में निखार का जरिया बने, न कि उनके लिए गलाकाट प्रतिस्पर्धा साबित हो। किसी भी परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास होना सबकी ख्वाहिश होती है और यह स्वाभाविक है। लेकिन अगर ज्यादा नंबर लाने की जद्दोजहद एक खास तरह के तनाव में तब्दील हो जाए तो यह सोचने की जरूरत है कि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई उनकी जिंदगी संवारने के लिए होनी चाहिए या उन्हें एक अंतहीन होड़ में झोंक देने के लिए!

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