editorial about bjp strategy for next loksabha election - संपादकीयः उपलब्धियों के बरक्स - Jansatta
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संपादकीयः उपलब्धियों के बरक्स

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के चार साल पूरे होने पर जैसी गर्मजोशी और गहमागहमी दिखी, उससे यही स्पष्ट हुआ कि भाजपा ने आम चुनाव के लिए अपना अभियान शुरू कर दिया है।

Author May 28, 2018 5:17 AM
उद्घाटन समारोह की झलकियां। (Photos: ANI)

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के चार साल पूरे होने पर जैसी गर्मजोशी और गहमागहमी दिखी, उससे यही स्पष्ट हुआ कि भाजपा ने आम चुनाव के लिए अपना अभियान शुरू कर दिया है। शनिवार को प्रधानमंत्री ने ओड़ीशा के कटक में विपक्ष पर हमले किए। रविवार को उन्होंने दिल्ली-मेरठ हाइवे का उद्घाटन और चिलचिलाती धूप में रोड शो किया। फिर भरी दोपहरी में बागपत जाकर ईस्टर्न पेरीफेरल एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन किया, एक सभा को संबोधित करते हुए खुले मन से अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाईं और विपक्ष पर हमला किया। इन दो दिनों में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और मोदी सरकार के मंत्रियों ने भी अलग-अलग संचार माध्यमों के जरिए सरकार की उपलब्धियों का बखान किया। हालांकि इस जश्न और सरकार के उपलब्धियां गिनाने पर विपक्षी दलों ने कुछ चुटकी लेने का प्रयास जरूर किया, पर प्रधानमंत्री की आवाज उन सब पर भारी नजर आई।

भाजपा के इस तरह आक्रामक ढंग से और रणनीतिक सूझ के साथ सरकार की उपलब्धियां गिनाने के पीछे बड़ी वजह यह है कि पिछले दिनों जिस तरह कर्नाटक में विपक्षी दलों ने एकजुटता दिखाई वह उसे बेअसर करना चाहती है। हालांकि कर्नाटक में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी, पर विपक्षी दलों की एकता की वजह से वह सरकार नहीं बना पाई। फिर मुख्यमंत्री पद के शपथग्रहण समारोह में कांग्रेस, सपा, बसपा आदि दलों के नेताओं ने शिरकत कर भाजपा को शिकस्त देने की शपथ खाई थी। वह कसक भाजपा के मन में कहीं न कहीं बनी हुई है। इसलिए वह नए सिरे से हर मंच पर तल्ख लहजे में विपक्षी दलों की कमियां बताने लगी है। कहीं न कहीं उसे लगने लगा है कि विपक्षी एकता बड़ी चुनौती बन सकती है। इसके अलावा, पिछले कुछ समय से प्रधानमंत्री की लोकप्रियता घटने के भी संकेत मिलने लगे थे, उससे भी भाजपा में घबराहट शुरू हो गई थी। कहना न होगा कि इससे उबरने के लिए उसने विपक्षी दलों के भ्रष्टाचार और नाकामियों को उजागर करना और अपनी उपलब्धियों को गिनाना शुरू कर दिया है।

यह सही है कि पिछली सरकारों की नाकामियों से ऊब कर और नरेंद्र मोदी के विकास के सपनों से आवेशित होकर लोगों ने भाजपा को प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र में भेजा था। सबका साथ सबका विकास के वादे के साथ सरकार ने जो योजनाएं बनाईं, उससे लोगों में उम्मीद भी पैदा हुई। मोदी सरकार ने कुछ साहसिक फैसले भी किए। मगर उन सबका मिलाजुला ही असर हुआ। अब भी बहुत सारे मामलों में सरकार को लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतरना चुनौती है। इसके बावजूद अधिकतर लोगों को कोई दूसरा विकल्प नजर नहीं आ रहा, जिससे दावा किया जा सके कि अगली लोकसभा में भाजपा बहुत कमजोर साबित होने वाली है। विपक्षी एकता जरूर उसे चुनौती पेश कर सकती है, क्योंकि चुनावी गणित जातीय समीकरण पर अक्सर बदल जाया करता है। इसलिए भाजपा की चिंता समझ में आती है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने पिछले दो दिनों में विपक्षी दलों को चुनावी राजनीति करने के मुद्दे पर भी बार-बार घेरा। लोकतंत्रीय व्यवस्था में अब यह भी एक सच्चाई है, उससे मुंह नहीं फेरा जा सकता। पर जब सत्ता पक्ष चुनाव के मैदान में उतरता है, तो उसे अपने किए का हिसाब देना ही पड़ता है, सो प्रधानमंत्री ने अभी से देना शुरू कर दिया है। वे इसमें कितना खरे उतरते हैं, देखने की बात है।

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