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संपादकीयः चुनावी जुमले

चुनाव के वक्त राजनेता अक्सर बड़े-बड़े मुद्दों को जुमलों में तब्दील कर उनके समाधान के सपने दिखाते रहते हैं। अक्सर ऐसे भी मसलों पर वे बोलना शुरू कर देते हैं, जिनका समाधान संविधान संशोधन के बगैर हो नहीं सकता।

Author April 5, 2019 1:56 AM
पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती (फोटो- एएनआई)

चुनाव के वक्त राजनेता अक्सर बड़े-बड़े मुद्दों को जुमलों में तब्दील कर उनके समाधान के सपने दिखाते रहते हैं। अक्सर ऐसे भी मसलों पर वे बोलना शुरू कर देते हैं, जिनका समाधान संविधान संशोधन के बगैर हो नहीं सकता। इसका नतीजा यह निकलता है कि आम लोगों में उन मसलों को लेकर एक भ्रम की स्थिति बनती है और वे उसे गलत तरीके से व्याख्यायित करना शुरू कर देते हैं। कश्मीर का मुद्दा भी कुछ ऐसा ही है। लंबे समय से कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताया जा रहा है, जो कि वह है भी, पर उससे जुड़ी धारा तीन सौ सत्तर और अनुच्छेद 35 ए को समाप्त करने को लेकर जिस तरह के भ्रामक बयान दिए जाते रहे हैं, उससे आम लोगों को कश्मीर की वास्तविक समस्या पता ही नहीं चल पाती। धारा तीन सौ सत्तर और अनुच्छेद 35 ए को समाप्त करना भाजपा की बड़ी चुनावी घोषणाओं में शुमार रहा है। इसी तरह कश्मीर की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और नेशनल कॉन्फ्रेंस आदि राजनीतिक पार्टियां धारा तीन सौ सत्तर के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ को बर्दाश्त न किए जाने की घोषणा करती रही हैं। पीडीपी की महबूबा मुफ्ती ने एक बार फिर दोहराया है कि अगर विलय की शर्तों के साथ छेड़छाड़ की गई तो कश्मीर से भारत का संबंध स्वत: विच्छेद हो जाएगा।

महबूबा ने यह घोषणा भाजपा अध्यक्ष के उस बयान के जवाब में की कि उनकी पार्टी अनुच्छेद 35 ए को समाप्त कर देगी। इस अनुच्छेद में जुबानी वादा किया गया था कि अगर कश्मीर की कोई लड़की दूसरे प्रांत के किसी व्यक्ति से विवाह कर लेती है, तो कश्मीर की अपनी पैतृक संपत्ति पर उसका कोई अधिकार नहीं होगा। इसी तरह अगर दूसरे प्रांत की कोई लड़की कश्मीरी व्यक्ति से विवाह करके वहां रहने लगती है, तो उसका वहां की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होगा। यह अनुच्छेद दरअसल धारा तीन सौ सत्तर की शर्तों को मजबूती प्रदान करने के लिए लागू किया गया था। यानी अगर 35 ए हटता है, तो धारा तीन सौ सत्तर प्रभावित होगी। इस तरह इसके साथ छेड़छाड़ आसान काम नहीं है। यह बात हर राजनीतिक दल समझता है। धारा तीन सौ सत्तर के साथ छेड़छाड़ का अर्थ है विलय की शर्तों को नजरअंदाज करना। यही वजह है कि पिछले चुनाव में खूब जोर-शोर से इसे हटाने की घोषणा करने के बाद, पांच साल तक प्रचंड बहुमत वाली सरकार होने के बावजूद, एनडीए सरकार उस दिशा में आगे नहीं बढ़ पाई।

ऐसा नहीं कि महबूबा मुफ्ती इस संवैधानिक अड़चन से वाकिफ नहीं हैं। विलय के नियम और शर्तों को बदलना आसान नहीं है। मगर चूंकि महबूबा मुफ्त कश्मीर के एक ऐसे क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतरी हैं, जो अलगाववाद का गढ़ माना जाता है। कश्मीर के मसले पर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर किए बिना वहां के लोगों का विश्वास जीतना मुश्किल है। इसलिए उन्होंने पर्चा दाखिल करने के साथ ही सबसे पहले कश्मीर के विलय संबंधी शर्तों का मुद्दा छेड़ दिया। इस तरह लोगों की भावनाओं को कुरदते रहने से न तो कश्मीर समस्या के हल की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है, और न पड़ोसी देश से मिल रही चुनौतियों से पार पाना आसान होगा। कश्मीर मसले का हल चुनावी रैलियों में जुमलेबाजी से नहीं निकल सकता, इसलिए राजनीतिक दलों को ऐसे गंभीर मुद्दों पर आम लोगों को बरगलाने से परहेज करना चाहिए।

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