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संपादकीयः विधायिका का दामन

एक जनहित याचिका पर चल रही सुनवाई के कारण राजनीति के अपराधीकरण का मुद््दा एक बार फिर चर्चा का विषय बना है।

एक जनहित याचिका पर चल रही सुनवाई के कारण राजनीति के अपराधीकरण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा का विषय बना है। अलबत्ता इस पर राजनीतिक दल फिलहाल खामोश हैं, जो इस स्थिति के लिए सबसे ज्यादा जवाबदेह हैं। याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने दोषी ठहराए गए कानून निर्माताओं यानी सांसदों व विधायकों को आजीवन चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करने के सवाल पर अस्पष्ट रवैया अपनाने के लिए निर्वाचन आयोग को आड़े हाथों लिया और कहा कि इस मामले में आयोग खामोश नहीं रह सकता है। दरअसल, इस मामले में दाखिल किए अपने हलफनामे में आयोग ने कहा था कि वह राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करने की हद तक प्रस्तुत याचिका का समर्थन करता है। पर साफ है कि यह बयान गोलमोल है, और इसमें असल सवाल से किनारा कर लिया गया है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि जिस तरह किसी न्यायिक अधिकारी या नौकरशाह को अदालत से दोषी सिद्ध होने पर हमेशा के लिए नौकरी से प्रतिबंधित कर दिया जाता है, वैसा ही कानून जनप्रतिनिधियों की बाबत भी होना चाहिए। इस पर सुनवाई के सिलसिले में सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग से अपना पक्ष रखने को कहा था।

केंद्र ने तो याचिका में की गई मांग को अनुचित बताते हुए उसे खारिज कर देने का अनुरोध किया, पर आयोग ने अपने हलफनामे में जो कुछ कहा उससे उसकी सदाशयता भले झलकती हो, यह नहीं पता चलता कि उसका रुख क्या है। इस पर अदालत की नाराजगी स्वाभाविक थी। अदालत ने झुंझलाते हुए यह तक कहा कि अगर विधायिका में बैठे लोगों की तरफ से आयोग की कोई विवशता है, या अपना दृष्टिकोण बताने में लाचार है, तो वह भी बताए। अब आयोग ने एक पूरक हलफनामा पेश करने का इरादा जताया है। उससे अदालत को तसल्ली होगी या नहीं, यह बाद में पता चलेगा, पर इस मामले में आयोग की सीमा या कठिनाई समझी जा सकती है। एक तरफ उसके अधिकारों की रक्षा करने की गारंटी संविधान ने सर्वोच्च न्यायालय को दे रखी है, पर दूसरी तरफ, संवैधानिक और स्वायत्त संस्था होने के बावजूद निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है। दोषी ठहराए गए विधायक और सांसद को ताउम्र चुनाव लड़ने से नाकाबिल ठहराने की मांग केंद्र खारिज कर चुका है। ऐसे में आयोग की मुश्किल का अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन यह भी स्वीकार करना होगा कि याचिका में एक नेक मकसद पेश तो कर दिया गया है, पर चुनौतियों और जटिलताओं को समझे बगैर। यह सही है कि आज विधायिका में ऐसे भी लोग हैं जिनके खिलाफ अदालतों में आपराधिक मामले लंबित हैं। पर सरकारी नौकरी और विधायिका की सदस्यता में फर्क है।

विधायिका की सदस्यता केवल निजी इच्छा या निजी काबिलियत की देन नहीं है, वह जन-इच्छा की देन है, मतदाताओं का फैसला है। इसीलिए विधायिका की सदस्यता के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता की शर्त नहीं रखी गई है, जो नौकरी में अनिवार्य है। कुछ लोग संसद या विधानसभा में हंगामे के मद््देनजर यह सलाह देते हैं कि काम नहीं तो वेतन (या भत्ता) नहीं का सिद्धांत लागू किया जाए। पर सांसद या विधायक का काम विधेयकों व प्रस्तावों का समर्थन ही करते जाना नहीं होता, बल्कि सरकार के अनुचित फैसलों तथा गलत नीतियों का विरोध करना भी होता है। इसलिए विधायिका की सदस्यता को सरकारी नौकरी की तरह देखने का आग्रह कभी नहीं होना चाहिए। हां, सर्वोच्च न्यायालय ने ठीक सुझाया है कि जनप्रतिनिधियों, नौकरशाहों तथा न्यायिक अधिकारियों पर लगे आरोपों पर सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित हों, ताकि ऐसे मामलों का तेजी से निपटारा हो सके।

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