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संपादकीयः संकट में संस्था

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने हाल में संस्था की माली हालत पर जिस तरह से चिंता व्यक्त की है और सदस्य देशों को चेताया है, वह गंभीर स्थिति का संकेत है। अब हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि कर्मचारियों को वेतन देने तक के लिए पैसे के लाले पड़ रहे हैं। गुतारेस ने संयुक्त राष्ट्र सचिवालय में काम करने वाले सैंतीस हजार कर्मचारियों को इस बारे में बता दिया है कि अब वेतन और भत्तों में कटौती होगी।

Author Published on: October 10, 2019 1:22 AM
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने हाल में संस्था की माली हालत पर जिस तरह से चिंता व्यक्त की है और सदस्य देशों को चेताया है, वह गंभीर स्थिति का संकेत है।

मंदी का असर सिर्फ देशों की अर्थव्यवस्था पर ही नहीं दिख रहा, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा और ताकतवर माने जाने वाला वैश्विक निकाय संयुक्त राष्ट्र भी घोर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जब इस वैश्विक संस्था ने पैसे की कमी की बात कही हो। कई साल से ऐसा हो रहा है जब साल के आखिर में इसके बजट पास होने की बात आती है तो हमेशा कटौती पर जोर दिया जाता है। पिछले साल संयुक्त राष्ट्र ने अपने सालाना बजट में साढ़े अट्ठाईस करोड़ डालर से ज्यादा की कटौती थी। संयुक्त राष्ट्र कोई कमाऊ संस्था नहीं है। उसका खर्चा सदस्य देशों के योगदान से ही चलता है। लेकिन लंबे समय से समस्या यह बनी हुई है कि सदस्य देश अपने हिस्से का योगदान नहीं दे रहे हैं। जो देश दे रहे हैं वे भी कटौती कर रहे हैं। ऐसे में संस्था के पास पैसे की आवक घट रही है और संकट बढ़ता जा रहा है। सवाल यह उठता है कि यह विश्व संस्था अपने को कैसे बचा पाएगी। अगर पैसा नहीं होगा तो धीरे-धीरे कामकाज ठप होते जाएंगे और यह निष्प्रभावी होती चली आएगी।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने हाल में संस्था की माली हालत पर जिस तरह से चिंता व्यक्त की है और सदस्य देशों को चेताया है, वह गंभीर स्थिति का संकेत है। अब हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि कर्मचारियों को वेतन देने तक के लिए पैसे के लाले पड़ रहे हैं। गुतारेस ने संयुक्त राष्ट्र सचिवालय में काम करने वाले सैंतीस हजार कर्मचारियों को इस बारे में बता दिया है कि अब वेतन और भत्तों में कटौती होगी। अबकी बार यह नौबत इसलिए आई है कि इस साल के जरूरी बजट का जो पैसा सदस्य देशों से आना था, उसका अभी तक सत्तर फीसद ही आया है। पिछले महीने संगठन को तेईस करोड़ डॉलर की नगदी का संकट झेलना पड़ा। ऐसी ही हालत इसी महीने भी बनी रहेगी। सवाल है ऐसे में किया क्या जाए? सिर्फ वेतन और भत्तों में कटौती से काम नहीं चलने वाला है। इसीलिए महासचिव ने खर्च में कमी के लिए दूसरे उपायों की भी बात कही है। जैसे सम्मेलनों और बैठकों को टाला जाएगा, इनमें कमी की जाएगी। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों की विदेश यात्राओं पर भी अंकुश लगाया जाएगा। कुल मिला कर संस्था के कामकाज पर असर पड़ना तय है।

आज बदलते विश्व में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गई है। शांति मिशनों से लेकर क्षेत्रीय विवादों के समाधान तक में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। छोटे से छोटा देश तक अपने विवादों के समाधान की उम्मीद लिए संयुक्त राष्ट्र का दरवाजा इसलिए खटखटाता है कि उसे पता है कि इस संस्था का बुनियादी मकसद ही विश्व शांति के लिए काम करना है। दुनिया के देशों में कानूनी विवाद सुलझाने के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय है, तो यूनिसेफ जैसी संस्था की अपनी बड़ी भूमिका है। ऐसे में अगर इन संस्थाओं के बजट में कटौती होती है तो इसका नुकसान बड़े देशों के बजाय छोटे मुल्कों को ज्यादा होगा। संयुक्त राष्ट्र के ज्यादातर शांति मिशन तीसरी दुनिया के देशों में या फिर पश्चिम एशिया के युद्धग्रस्त क्षेत्रों में चल रहे हैं। ऐेसे में खर्च में कटौती का खमियाजा उन देशों के नागरिकों को ही उठाना पड़ेगा। अगर संयुक्त राष्ट्र को बचाए रखना है तो सदस्य देशों को अपने निहित स्वार्थों से ऊपर उठना होगा और योगदान के मसले पर राजनीति बंद करनी होगी।

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