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संपादकीय: भरोसे का विकास

विकास के मामले में भारत पहले ही कई चुनौतियों का सामना कर रहा था, उसमें कोरोना संकट के चलते पूर्णबंदी की विवशता ने उन्हें और बढ़ा दिया। वाहन उद्योग, खनन और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों की गति थम गई। सबसे बुरी मार छोटे और मझोले उद्योगों पर पड़ी है। यह क्षेत्र यों बहुत छोटी पूंजी से चलता है, पर रोजगार के सबसे अधिक अवसर यही उपलब्ध कराता है। इसलिए जब इस पर मार पड़ी तो सबसे अधिक श्रमिकों का पलायन इसी क्षेत्र से हुआ है।

Author Published on: June 3, 2020 5:08 AM
PM MODIप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (ANI)

पूर्णबंदी के बाद जब अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी है, उद्योग जगत में चिंता का माहौल है, तमाम रेटिंग एजेंसियां विकास दर के अब तक के सर्वाधिक निचले स्तर पर रहने का अनुमान पेश कर रही हैं, प्रधानमंत्री ने भरोसा दिलाया है कि देश फिर से विकास की नई ऊंचाइयों पर पहुंचेगा। भारतीय उद्योग परिसंघ यानी सीआइआइ के सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हमें अपने कौशल, प्रतिभा, प्रबंधन, तकनीक, किसानों और छोड़े-बड़े उद्यमियों पर भरोसा है।

इनके बल पर हम फिर से दुनिया में आर्थिक शक्ति के रूप में उभरेंगे। प्रधानमंत्री ने अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए आत्मनिर्भरता का मंत्र दिया है। वे उद्यमियों में इस संकट को एक अवसर के रूप में भुनाने का जज्बा भी भरते रहे हैं। यानी दूसरे देशों पर निर्भरता त्याग कर अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल किया जाए, तो जल्दी ही अर्थव्यवस्था में जान फूंकी जा सकती है। पूर्णबंदी के दौरान किसानों, छोटे और मझोले तथा बड़े उद्योगों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए भारी-भरकम राहत पैकेज की भी घोषणा की गई है, जिससे उन्हें फिर से अपने पैरों पर खड़ा हो सकने की उम्मीद की जा रही है।

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में उद्योगपतियों को भरोसा दिलाया है कि सरकार उनकी सुविधाओं के मद्देनजर हर सहयोग करने को तत्पर है। निस्संदेह इससे उद्योग जगत में कुछ ऊर्जा का संचार हुआ होगा।

विकास के मामले में भारत पहले ही कई चुनौतियों का सामना कर रहा था, उसमें कोरोना संकट के चलते पूर्णबंदी की विवशता ने उन्हें और बढ़ा दिया। वाहन उद्योग, खनन और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों की गति थम गई। सबसे बुरी मार छोटे और मझोले उद्योगों पर पड़ी है। यह क्षेत्र यों बहुत छोटी पूंजी से चलता है, पर रोजगार के सबसे अधिक अवसर यही उपलब्ध कराता है। इसलिए जब इस पर मार पड़ी तो सबसे अधिक श्रमिकों का पलायन इसी क्षेत्र से हुआ है।

सो, सरकार ने इस क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया है। इस क्षेत्र में निवेश की संभावनाएं बढ़ाने का प्रयास किया गया है, इनसे जुड़े श्रमिकों की स्थिति सुधारने, उनके भविष्य निधि में अंशदान देने के कदम उठाए गए हैं। एमएसएमइ की परिभाषा बदल कर इसमें निवेश की सीमा बढ़ा दी गई है। पर यह चुनौती बनी हुई है कि श्रमिकों के पलायन और जमा पूंजी खत्म होने के बाद इनमें से कितनी इकाइयां फिर से अपने दम पर खड़ी होने का साहस दिखा पाएंगी।

अर्थव्यवस्था काफी कुछ बाजार पर निर्भर करती है, जहां मांग बढ़नी जरूरी है। हालांकि रिजर्व बैंक कई दफा बाजार में रौनक लौटाने के मकसद से ब्याज दरों में कटौती कर चुका है, पर अब भी स्थिति सामान्य होती नजर नहीं आ रही। फिर आत्मनिर्भरता के मंत्र का पूरी तरह पालन करना भी आसान नहीं, क्योंकि इससे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और तमाम देशों के साथ व्यापारिक करार बाधित होने का खतरा है। पहले ही लोगों की क्रय शक्ति क्षीण हो चुकी है, बड़े पैमाने पर रोजगार जा चुके हैं, नए रोजगार के अवसर पैदा होने की जल्दी संभावना नजर नहीं आती, ऐसे में बाजार में ताकत भरना आसान नहीं है।

मगर बंदी के बाद जिस तरह फिर से उद्योग जगत दम भरता दिख रहा है, और उसमें सरकार से सहयोग का यकीन पैदा हुआ है, कुछ बेहतरी की उम्मीद से इनकार नहीं किया जा सकता। खनन, ऊर्जा, तकनीक आदि क्षेत्रों में भरपूर संभावनाएं हैं, उनका समुचित दोहन अर्थव्यवस्था को ताकत दे सकता है।

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