हर साल संसद में पेश होने वाली आर्थिक समीक्षा आमतौर पर इस बात का ब्योरा होती है कि पिछले बजट में देश की अर्थव्यवस्था और अन्य मोर्चे पर सुधार के लिए जो वादे किए गए थे, वे किस हद तक पूरे किए जा सके। यह इसका भी संकेत होता है कि अगले वित्त वर्ष में सरकार के आर्थिक फैसलों में किन मसलों को प्राथमिकता मिल सकती है। इस लिहाज से देखें, तो वित्त मंत्री ने जो आर्थिक समीक्षा पेश की है, वह देश की परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खड़ी हो रही आर्थिक चुनौतियों के बीच उम्मीद जगाती है, लेकिन यह आने वाले वक्त के जोखिमों के प्रति आगाह भी करती है।

समीक्षा में वित्त वर्ष 2026-27 में सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.8 फीसद से 7.2 फीसद के बीच रहने का अनुमान जताया गया है। विदेशी पूंजी प्रवाह में कमी के कारण रुपए पर प्रतिकूल असर और बीते वर्ष भारतीय मुद्रा में कमजोरी के बावजूद यह अनुमान अर्थव्यवस्था में स्थिरता का संकेत देता है। हालांकि समीक्षा में विकसित भारत और वैश्विक प्रभाव का लक्ष्य हासिल करने के उद्देश्य से मजबूत और स्थिर मुद्रा को एक स्वाभाविक जरूरत बताने के समांतर रुपए के मूल्य में गिरावट को हानिकारक नहीं माना गया, क्योंकि यह भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी शुल्क में इजाफे के असर को कुछ हद तक कम करता है।

दूसरी ओर, यूरोप के साथ मुक्त व्यापार समझौते को लेकर यह उम्मीद जताई गई है कि यह भारत की विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मक, निर्यात और रणनीतिक क्षमता को मजबूत करेगा। समीक्षा के मुताबिक, अनिश्चित वैश्विक माहौल में भारत को घरेलू वृद्धि को प्राथमिकता देने की जरूरत है और इसके लिए वित्तीय सुरक्षा उपायों और नकदी पर ज्यादा जोर देना चाहिए। जाहिर है, वैश्विक आर्थिक मोर्चे पर तेजी से बदलते समीकरण और भू-राजनीतिक परिदृश्य के मद्देनजर भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित बनाने के लिए अपने हितों के अनुकूल उपाय करने होंगे।

आर्थिक समीक्षा में नवोन्मेष और वैश्विक पहलकदमियों को कमजोर किए बिना दक्षता और स्वदेशी को अपनाने का आह्वान किया गया है, जो निश्चित रूप से आत्मनिर्भरता की संभावनाओं को मजबूत करेगा। कृषि क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है। इस बिंदु पर सर्वेक्षण में यह कहा गया है कि कृषि निर्यात में व्यापार नीति का उपयोग कीमतों और उत्पादन में अस्थिरता के बीच अल्पकालिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है। मगर बार-बार नीतिगत बदलाव आपूर्ति शृंखला को बाधित करते हैं।

यह देखने की बात होगी कि समीक्षा में जाहिर इस चिंता के संदर्भ में बजट की क्या दिशा होती है। यों, महंगाई का असर नरम रहने और अगले वर्ष भी चिंता का बड़ा कारण नहीं बनने को लेकर उम्मीद जताई गई है। समीक्षा में अस्थायी कामगारों के लिए काम से जुड़ी शर्तें नए सिरे से तय करने के उद्देश्य से नीति लाने की जरूरत पर जोर दिया गया है। इसके अलावा, नागरिकों की सेहत की सुरक्षा के मद्देनजर अधिक वसा और चीनी वाले अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की बढ़ती खपत पर चिंता जताई गई है और इन उत्पादों के विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव भी दिया गया है।

आर्थिक समीक्षा में कई राज्यों में लोकलुभावन घोषणाओं और नकद अंतरण के कारण राजस्व घाटा बढ़ने को लेकर भी चिंता जताई गई। सवाल है कि जिस दौर में मुफ्त सुविधाओं की घोषणा को चुनावी जीत का जरिया बनाने की प्रवृत्ति हावी हो रही हो, उसमें बजट में क्या कोई ऐसी घोषणा सामने आ सकती है, जो इस पर लगाम लगाए!