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संपादकीयः कर्ज का संकट

पाकिस्तान को कर्ज हासिल करने के लिए नाको चने चबाने पड़ रहे हैं। इसके लिए उसे आइएमएफ की हर शर्त के आगे झुकना है।

Author October 17, 2018 1:57 AM
पाकिस्तान के लिए यह वक्त चेतने का है। अगर उसे कर्ज के महारोग से मुक्ति पानी है तो अपने नौजवानों को विकास में लगाए, न कि उन्हें आतंकवाद की आग में झोंके।

पाकिस्तान की नई सरकार ने कर्ज के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमफ) का दरवाजा खटखटाया है। जाहिर है, पड़ोसी मुल्क गंभीर आर्थिक मुश्किल में फंस चुका है। संकट इतना भयावह है कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में दशकों लग सकते हैं। देश खरबों डॉलर के कर्ज में डूबा है। हालत यह है कि वह ब्याज चुकाने तक की हालत नहीं है। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी (पीटीआइ) के नेतृत्व वाली सरकार को सत्ता में आए तीन महीने होने जा रहे हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था दुरुस्त करने का उसके पास कोई रास्ता नहीं है। बल्कि ऐसा लगता है कि पाकिस्तान की माली हालत को सुधारने का किसी के पास कोई उपाय नहीं है। इमरान खान को पाकिस्तान का यह संकट विरासत में मिला है। पाकिस्तान में चाहे फौजी सरकार रही हो या फिर निर्वाचित सरकार, सबने कर्ज ही खाया और आज यह पाकिस्तान के ऊपर पहाड़ जैसा बन चुका है। सत्ता में आने से पहले इमरान खान की पार्टी ने भी लोगों से वादा किया था कि वे सबसे पहले मुल्क की माली हालत सुधारेंगे। लेकिन अपने पूर्ववर्तियों की तरह इमरान खान ने भी कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए कर्ज मांगा है।

दरअसल, पाकिस्तान को कर्ज हासिल करने के लिए नाको चने चबाने पड़ रहे हैं। इसके लिए उसे आइएमएफ की हर शर्त के आगे झुकना है। इसमें सबसे बड़ी शर्त यह है कि उसे कर्ज लेने के लिए इस वैश्विक बैंक के सामने चीन-पाक आर्थिक गलियारे के समझौते वाले दस्तावेज पेश करने होंगे। चीन और पाकिस्तान की यह ऐसी मिली-जुली परियोजना है जो अब तक गुपचुप तरीके से चलती आ रही थी और भारत के लिए भी बड़ा सिरदर्द बनी हुई है। चीन इस रास्ते अरब सागर तक पहुंच बनाएगा और वहां से अफ्रीका महाद्वीप पहुंचेगा। चीन की इस सामरिक रणनीति से अमेरिका भी खुश नहीं है। इसलिए पाकिस्तान को आइएमएफ से कर्ज मिलेगा भी या नहीं, इस बारे में कोई फैसला नहीं हुआ है। अमेरिका चाहता है कि अब पाकिस्तान को दिए जाने वाले कर्ज और मदद पर बारीकी से नजर रखी जाए, ताकि वह इसका उपयोग आतंकवाद को बढ़ावा देने और चीन को कर्ज लौटाने में न करे। इस तरह अमेरिका पाकिस्तान के जरिए चीन पर नकेल कसना चाहता है। चुनाव से ठीक पहले पाकिस्तान के कुछ अर्थशास्त्रियों ने चेता दिया था कि जिस तरह के हालात हैं उनमें आइएमएफ के पास जाने के अलावा कोई और चारा नहीं है। पिछले पांच साल में यह तीसरा मौका है जब पाकिस्तान आइएमएफ के पास पहुंचा है।

नई सरकार को झटका सिर्फ आर्थिक मोर्चे पर लग रहा हो, ऐसा नहीं है। इमरान खान की पार्टी भी कोई बहुत अच्छी हालत में नहीं है। देश जानता है कि इमरान खान सेना की मेहरबानी से ही चुनाव जीते हैं और सत्ता में आए हैं। हाल में हुए उपचुनाव में पीटीआइ को खासा झटका लगा है, बल्कि नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल (नवाज) की स्थिति अच्छी हुई है। इससे नेशनल असेंबली में विपक्ष को मजबूती मिली है। पीटीआइ को अवाम का यह संदेश समझना चाहिए। पाकिस्तान आज जो मार झेल रहा है उसकी जड़ में आतंकवाद है। पाकिस्तान की फौज और खुफिया एजेंसी आइएसआइ के पास आतंकवाद एकसूत्रीय अभियान है। इसलिए पूरे मुल्क में कहीं तरक्की दिखाई नहीं देती। लिहाजा, पाकिस्तान के लिए यह वक्त चेतने का है। अगर उसे कर्ज के महारोग से मुक्ति पानी है तो अपने नौजवानों को विकास में लगाए, न कि उन्हें आतंकवाद की आग में झोंके। देश के नौजवान सही राह पकड़ेंगे तो मुल्क में आर्थिक खुशहाली का रास्ता भी बनेगा।

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