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संपादकीयः संकट और लाचारी

पिछले कुछ महीनों में पेट्रोल और डीजल के दाम जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, उसका नतीजा महंगाई बढ़ने के रूप में सामने आया है और इसकी सीधी मार आम आदमी पर पड़ रही है।

Author October 30, 2018 11:38 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है

पेट्रोल और डीजल के लगातार बढ़ते दामों के आगे सरकार अपने हाथ खड़े कर चुकी है। सरकार ने साफ कह दिया है कि पेट्रोलियम पदार्थों के दाम नियंत्रणमुक्त किए जा चुके हैं और इनका निर्धारण अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से होता है, इसलिए इसमें कोई दखल नहीं दे सकते। इसका सीधा अर्थ यही है कि जनता इसकी मार झेलने को तैयार रहे। दिखाने के लिए फौरी राहत के तौर पर सरकार ने हाल में उत्पाद शुल्क में कटौती का कदम तो उठाया था और राज्यों से भी वैट कम करने को कहा था, लेकिन यह बेअसर साबित हुआ। दरअसल, यह कोई दीर्घकालिक समाधान नहीं था और न ही इसके पीछे कोई तर्कसंगत कारण थे। जब पेट्रोल और डीजल रोजाना कुछ पैसे महंगे हो रहे हैं तो यह राहत भी कुछ ही दिन में खत्म हो गई। जाहिर है, यह कदम केवल इसलिए उठाया गया था कि महंगाई के मुद्दे पर लोगों के बढ़ते गुस्से को रोका जा सके। पर सवाल है अब क्या होगा।

पिछले कुछ महीनों में पेट्रोल और डीजल के दाम जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, उसका नतीजा महंगाई बढ़ने के रूप में सामने आया है और इसकी सीधी मार आम आदमी पर पड़ रही है। हाल में महंगाई के जो आंकड़े आए हैं, उनसे साफ है कि पेट्रोलियम उत्पादों के आसमान छूते दाम ही महंगाई बढ़ा रहे हैं। पेट्रोल-डीजल महंगा होने का सीधा असर ढुलाई पर पड़ता है और हर चीज महंगी होती है। सितंबर में खाद्य पदार्थों की महंगाई से थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति बढ़ती हुई दो महीने के उच्चतम स्तर 5.13 फीसद पर पहुंच गई। जबकि अगस्त में यह 4.53 फीसद और पिछले साल सितंबर में 3.14 फीसद थी। चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले एक साल में पेट्रोल 17.21 और डीजल 22.18 फीसद महंगा हुआ। सितंबर में ही खुदरा मुद्रास्फीति में भी तेजी दर्ज की गई। ये आंकड़े यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि महंगाई बढ़ रही है, लेकिन इस पर अंकुश लगा पाने में सरकार इसलिए नाकाम है कि पेट्रोल और डीजल के दाम उसके वश में नहीं हैं।

पेट्रोल-डीजल के दामों को लेकर सरकार जो तर्क देती आ रही है, उनमें रुपए की कमजोरी, अंतरराष्ट्रीय बाजार का संकट, अमेरिका के दबाव में ईरान से तेल न मिल पाने जैसे कारण हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या जनता को महंगाई की मार झेलने के लिए छोड़ दिया जाए। आर्थिक मोर्चे पर आने वाले ऐसे संकटों से निपटने के लिए सरकार के पास क्या कोई रास्ता नहीं है? अगर ऐसा है तो यह सरकार की नीतिगत पंगुता को उजागर करता है। इससे स्पष्ट है कि सरकार या तो आने वाले संकटों को भांप नहीं पा रही, या फिर उसके सामने ऐसे हालात से निपटने के लिए रास्ते बंद हो गए हैं। मौजूदा हालात बता रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम अभी महीनों कम नहीं होंगे। तब क्या होगा? भारत के सामने भविष्य की सबसे गंभीर चुनौती ऊर्जा संबंधी संसाधनों की है। हालत यह है कि भारत में कच्चे तेल की खोज के लिए कोई भी विदेशी कंपनी निवेश नहीं करना चाहती। तेल निर्यातक देशों का संगठन ओपेक तेल उत्पादन बढ़ा नहीं रहा। ऐसे में अगर हम अंतरराष्ट्रीय बाजार पर ही निर्भर बने रहेंगे तो संकट कभी खत्म नहीं होगा। जरूरी है कि भारत इसके लिए दीर्घकालिक विकल्पों की तलाश करे और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े।

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