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आत्म बगैर कथा

संदीप जोशी आत्मकथा लिखने का एक समय होता है। जीवनी लिखने की भी एक उम्र होती है। आत्मकथा या जीवनी लिखना जीवन में मिली आशा-निराशा के अंतर को समझ कर पाटने और दर्शाने की कला है। आत्मकथा में पूरा जीवन समा नहीं सकता। कथा के मायने जीवन के समय में बदलते हैं। फिर एक अदद […]

संदीप जोशी

आत्मकथा लिखने का एक समय होता है। जीवनी लिखने की भी एक उम्र होती है। आत्मकथा या जीवनी लिखना जीवन में मिली आशा-निराशा के अंतर को समझ कर पाटने और दर्शाने की कला है। आत्मकथा में पूरा जीवन समा नहीं सकता। कथा के मायने जीवन के समय में बदलते हैं। फिर एक अदद आत्मकथा में जीवन को कैसे पिरोया जा सकता है!

लेकिन अपन बाजार युग में जी रहे हैं। आज अगर बाजार अपने समाज को चला रहा है, तो फिर हमारी लेखनी उससे कैसे अनछुई रह सकती है। बाजार का मंत्र ही है ‘दिल मांगे मोर’। बेशक महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर का खेल ही जीवन रहा हो, लेकिन वे भी जीवन भर नहीं खेल सकते थे। खेल छोड़ने के बाद वे बाजार की खबर कैसे बने रहें? उनकी आत्मकथा की खेल प्रेमियों से ज्यादा बाजार को जरूरत थी। इसलिए जैसे सचिन को राज्यसभा के लिए फुसलाया गया वैसे ही इस आत्मकथा के लिए भी उकसाया गया। आंखों से ओझल होना ही क्या दिमाग से उतरना होता है! खेल से संन्यास लेने के साल भर के अंदर ही उनकी आत्मकथा आना आश्चर्यजनक है।
‘प्लेइंग इट माय वे’ नामक आत्मकथा द्वारा सचिन के खेल जीवन को खेल पत्रकार बोरिया मजूमदार ने भड़काऊ-उकसाऊ किस्सों द्वारा उकेरने की कोशिश की है। इस खेल जीवन के घटनाक्रम को आत्मकथा का बिकाऊ रूप दिया। इसलिए बाजार इस पर गदगद है कि सचिन की आत्मकथा विश्व में सबसे ज्यादा और तेजी से बिकने वाली किताब हो गई है। सचिन के बल्ले से निकले एक और शतकीय आंकड़े की तरह इसे देखा जा रहा है। लेकिन इस बार सचिन की ओर से बल्लेबाजी बोरिया मजूमदार ने की है।

जाहिर है, महानता के पास कहने को बहुत कुछ स्थितिगत, रोमांचकारी और प्रेरणादायक होता है। सचिनभक्त क्रिकेट प्रमियों को वही परोसा गया है। लेकिन ‘प्लेइंग इट माय वे’ में जो खेल उभरा है वह महज उत्तेजित किस्सागोई है। सचिन, बोरिया के शब्दों में कहते हैं कि 2007 विश्व कप से कुछ महीने पहले तब के भारतीय कोच ग्रेग चैपल उनके घर आए थे। बात-बात में सचिन को भारतीय कप्तान बनने की पेशकश उनने रखी। और यह भी कि सचिन के कप्तान बनने के बाद वे दोनों मिल कर लंबे समय तक भारतीय क्रिकेट को चला सकते हैं।

किताब में सचिन ने जताया कि यह सुनने पर वे हैरान हुए और आश्चर्य में पड़ गए। उनके अनुसार चैपल खुदगर्ज, शातिर और मौकापरस्त कोच थे। चैपल को भारतीय कप्तान राहुल द्रविड और अन्य खिलाड़ियों के प्रति न भरोसा था, न सम्मान। चैपल मनमर्जी के मुंहफट मौला थे। उम्र की ढलान पर घिसटते खिलाड़ियों को बाहर कर चैपल एकछत्र राज चाहते थे। सचिन का यह चैपल-आकलन सही भी हो सकता है। क्योंकि ग्रेग चैपल को लाने वाले सौरव गांगुली से भी उनकी तनातनी हो गई थी।
सन 2003 के विश्व कप में सफलता के बाद गांगुली भारतीय क्रिकेट के शिखर पर पहुंचे थे। एक कोच के नाते चैपल को गांगुली उतना ही करने दे सकते थे, जितना उनके लिए उपयोगी रहता। चैपल भी गांगुली की तरह इकतरफा पसंद-नापसंद वाले व्यक्ति थे। तकरार में पड़ना दोनों का स्वभाव था। गांगुली की बल्लेबाजी में बिखराव के बावजूद उनके तेवर तेज ही रहे। विफल बल्लेबाजी में भी तेवर दर्शाते कप्तान को क्रिकेट संघ सहन नहीं कर पा रहा था। गांगुली को जाना पड़ा। खैर, गांगुली से व्यावहारिक भिड़ंत में तो चैपल भारी पड़े, लेकिन सचिन से भिड़ंत हुई तो चैपल को ही जाना पड़ा।

चैपल भक्तीय छवि के धनी सचिन को भी बाहर करने पर उतारू थे। वे भारतीय क्रिकेट को ‘रिंग मास्टर’ होकर चलाना चाहते थे। उस समय के ज्यादातर खिलाड़ी चैपल के खिलाफ बगावत पर उतर आए थे। सचिन की बगावत ही उन पर भारी पड़ी। सचिन के खेल जीवन में एक चैपल विवाद ही अनछुआ था। इसीलिए बेसमय आत्मकथा लिखवानी पड़ी। चैपल ने सचिन की किस्सागोई को सरासर नकारा है। उनने कहा है कि वे सिर्फ एक बार सचिन के घर गए, जब वे चोट से उबरने के प्रयास में लगे थे। कप्तानी को लेकर उनमें कोई बात नहीं हुई। किताब में बताए गए समय से वह समय साल भर पहले का था।

अब सवाल है कि किसके अर्धसत्य को क्रिकेट प्रेमी सत्य मानें? समय की किस्सागोई से ज्यादा समयकाल की समझ जरूरी है। शब्दों को समझना भी शब्दों को बोलने और लिखने जितना ही जरूरी होता है। ‘प्लेइंग इट माय वे’ को सचिन की खेल शैली नहीं मानना चाहिए। कपिल देव को कमजोर कोच मानना अलग बात है, मगर चैपल और सचिन का एक दूसरे को ‘झूठा’ कहना विपरीत। चैपल की नाकाबिलियत दुनिया जानती थी, मगर सचिन को झूठा-फरेबी कहने को पचाना मुश्किल है। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है? बोरिया या बाजार? या खुद सचिन रमेश तेंदुलकर?

 

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