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मायापुरी इलाके के कारोबारी यह तर्क देकर अपना बचाव करते रहे हैं कि वे ऐसा कोई काम नहीं करते, जिससे प्रदूषण फैलता है। वे लंबे समय से उस इलाके में कारोबार करते आ रहे हैं।

Author April 15, 2019 1:43 AM
मायापुरी औद्योगिक क्षेत्र की करीब आठ सौ दुकानों और कारखानों को नोटिस भेजा गया था।

सार्वजनिक भूखंडों पर कब्जा, अनधिकृत रूप से भवन निर्माण, हरित मानकों को धता बताते हुए रिहाइशी इलाकों में प्रदूषण फैलाने वाले कारखान्नों पर अंकुश लगाना महानगरों में बड़ी चुनौतीपूर्ण समस्या है। यही वजह है कि दिल्ली और इससे सटे इलाकों में ऐसे निर्माण और औद्योगिक इकाइयों को हटाने के लिए अक्सर प्रशासन को कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। दिल्ली के मायापुरी औद्योगिक क्षेत्र में प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयों को हटाने पहुंचे दस्ते पर कारोबारियों का पथराव और उसमें सरकारी दस्ते और स्थानीय लोगों समेत चालीस से ऊपर लोगों का घायल हो जाना इसी की एक कड़ी है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण लंबे समय से नगर निगम और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति पर दबाव डालता रहा है कि रिहाइशी इलाकों से प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयों को हटाया जाए। इसी आदेश के तहत मायापुरी औद्योगिक क्षेत्र की करीब आठ सौ दुकानों और कारखानों को नोटिस भेजा गया था। इन दुकानों-कारखानों के कारण उस इलाके में काफी प्रदूषण फैलता है।

मायापुरी इलाके के कारोबारी यह तर्क देकर अपना बचाव करते रहे हैं कि वे ऐसा कोई काम नहीं करते, जिससे प्रदूषण फैलता है। वे लंबे समय से उस इलाके में कारोबार करते आ रहे हैं। नोटिस की इसी अनदेखी के बाद दिल्ली पुलिस, अर्धसैनिक बल, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति और दक्षिण दिल्ली नगर निगम का दस्ता वहां दुकानों और कारखानों में तालाबंदी यानी सीलिंग के लिए गया था। इस पर स्थानीय कारोबारियों ने जमकर पथराव किया। यह कोई नई घटना नहीं है। दिल्ली के विभिन्न इलाकों में अनधिकृत रूप से चल रहे ऐसे कारखानों को हटाने के लिए इसी तरह प्रशासन को संघर्ष करना पड़ता रहा है। विचित्र है कि करीब बीस साल पहले अदालत के आदेश पर दिल्ली के रिहाइशी इलाकों से प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों को हटाने का प्रयास किया गया था। उसमें दिल्ली में चल रहे कारखाना मालिकों को नोएडा और हरियाणा-राजस्थान की सीमा पर बने औद्योगिक इलाकों में सस्ती दर पर भूखंड आबंटित किए गए थे, ताकि वे अपनी औद्योगिक इकाइयां उठा कर वहां ले जा सकें। बहुत सारे कारखाने दिल्ली से बाहर चले गए। मगर फिर भी बहुत सारे लोग चोरी-छिपे ऐसे कारखाने चलाते रहे। अब भी दिल्ली में ऐसे कारखानों की बड़ी तादाद है, जिनसे प्रदूषण फैलता है।

दिल्ली में प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों की मौजूदगी की वजह है राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी। यह भी छिपी बात नहीं है कि दिल्ली की राजनीति में सक्रिय राजनीतिक दल खुद अनधिकृत कॉलोनियों और कारखानों को नियमित कराने के आश्वासन के साथ अपना जनाधार बढ़ाने का प्रयास करते रहते हैं। फिर दिल्ली और केंद्र के बीच कई अधिकारों को लेकर द्वंद्व बना रहता है, जिसका फायदा उठाते हुए केंद्र सरकार ऐसे अवैध कारखानों की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर और राज्य सरकार केंद्र पर डाल कर अपना पल्ला झाड़ने का प्रयास करती रहती हैं। इसी का नतीजा है कि ऐसी इकाइयों को हटाने के लिए खासा बल प्रयोग करना पड़ता है। जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति दृढ़ नहीं होगी, यह समस्या बनी रहेगी।

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