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मजबूरी के मारे

इस महामारी ने लाखों लोगों की जिंदगी छीन ली, तो करोड़ों लोगों के सामने जिंदा रहने की चुनौतियां भी बिखेर दी हैं।

डब्ल्यूएचओ की प्रमुख वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन ने कहा कि कोरोनावायरस का बढ़ता संक्रमण इस बात का प्रमाण है कि यह महामारी अभी ख़त्म नहीं हुई है। (फोटो – रायटर्स)

इस महामारी ने लाखों लोगों की जिंदगी छीन ली, तो करोड़ों लोगों के सामने जिंदा रहने की चुनौतियां भी बिखेर दी हैं। लाखों परिवारों ने अपना इकलौता कमाने वाला सदस्य खो दिया, तो हजारों बच्चे अनाथ हो गए। उनके सामने दो वक्त की रोटी का असरा भी नजर नहीं आता। इस महामारी के मारों में ऐसे भी बहुत सारे लोग हैं, जिनका गुजारा बाजारों, सड़कों, बस अड््डों, रेलवे स्टेशनों, समुद्र तटों के किनारे लगी रहने वाली भीड़ की वजह से चल जाया करता था। मगर कोरोना के चलते भीड़भाड़ पर रोक लगी और सैरगाहों में सन्नाटा पसर गया तो उन जगहों पर अपना हुनर दिखा कर कुछ कमा लेने वालों के लिए दो वक्त का भोजन जुटाना मुश्किल हो गया। इसका ताजा उदाहरण तिरुवनंतपुरम का एक दिव्यांग गायक है, जो बस अड््डे से लेकर समुद्र तट तक भीडभाड़ वाली जगहों पर पुराने गीत गाता और सैलानियों से मिली बख्शीश से अपना गुजारा चलाता था। कोरोना के चलते सैलानियों का आना बंद हो गया, तो उसकी कमाई का जरिया भी बंद हो गया। अब उस गायक की स्थिति यह है कि वह भीख मांगने पर मजबूर है। अपने चारपहिया स्कूटर पर उसने लिख रखा है कि उसका लिवर और किडनी बिकाऊ है। उसके भीतर के गायक ने दम तोड़ दिया है। वह कई दिनों से भूखा है, कृपया उसे दान दें।

ऐसे न जाने कितने गा-बजा कर, हाथ की सफाई, तमाशे, करतब वगैरह दिखा कर अपनी दैनिक जरूरतें पूरी करने वाले लोग इस दौरान बेहाल हो गए हैं। जिन दिहाड़ी मजदूरों, रेहड़ी-पटरी पर रोजगार करने वालों के काम छिन गए और उनमें से लाखों अपने पैतृक घरों को लौट गए, उनमें से बहुत सारे लोगों ने तो रोजी के दूसरे साधन तलाशने शुरू कर दिए, बहुतों ने मनरेगा जैसी योजनाओं में काम तलाश भी लिया, मगर अपना हुनर दिखा कर पेट भरने वालों के सामने तो कोई विकल्प भी नहीं बचा। ऐसे लोगों को अपनी कला, अपने हुनर पर भरोसा और अपनी कला को जीने की जिद होती है। फिर उनमें जो दिव्यांग हैं, उनके सामने तो और मुश्किलें पेश आती हैं। वे कोई मेहनत-मशक्कत का काम कर भी नहीं सकते। उनके लिए तो कमाई का जरिया उनका हुनर ही होता है। यह केवल हमारे देश में नहीं, दुनिया भर में है। बाजारों, मेलों, पर्यटन स्थलों पर वे अपना हुनर दिखाते, लोगों का मनोरंजन करते और इनसे मिले इनाम-इकराम से अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं।

कोरोना के चलते लोगों के रोजगार छिन जाने पर उचित ही चिंता जताई गई और सरकारी स्तर पर उन्हें मदद पहुंचाने की योजनाएं बनीं, तो उनमें मजदूर और छोटे-मोटे काम करके गुजारा करने वाले लोगों के लिए कुछ समय तक राशन वगैरह उपलब्ध कराने पर विचार किया गया। मगर जो अपनी कला, अपने हुनर के बल पर स्वाभिमान के साथ जीवन गुजार रहे थे, उनके लिए शायद ही मदद की अलग से कोई योजना बनी। तिरुवनंतपुरम के बदहाल गायक के बारे में सोशल मीडिया पर सूचना प्रसारित होने के बाद वहां के परिवहन मंत्री और विधायक उसकी मदद के लिए आगे आए हैं। अगर उसने अपने स्कूटर पर अपनी स्थिति बयान न की होती, तो शायद उसे यह मदद भी न मिल पाती। मगर उसकी तरह भुखमरी झेल रहे लाखों गायकों, करतब दिखाने, लोगों का मनोरंजन करने वालों और बजिद अपनी कला के साथ जुड़े लोगों को मदद कैसे पहुंचे, इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

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