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संपादकीय : आयुध में आग

असली वजह जांच के बाद पता चलेगी, पर सोचने की जरूरत है कि ऐसे हादसों पर रोक लगाने का क्या उपाय हो। इससे पहले भी कई आयुध डिपो में आग लग चुकी है, जिसके चलते सैकड़ों करोड़ का सैन्य साजो-सामान खाक हो चुका है।
Author नई दिल्ली | June 1, 2016 22:22 pm
महाराष्ट्र के वर्धा जिले के पुलगांव में केंद्रीय आयुध डिपो में आग लगी।

महाराष्ट्र के पुलगांव स्थित आयुध डिपो में लगी आग ने एक बार फिर सैन्य साजो-सामान के रखरखाव में संजीदगी की जरूरत रेखांकित की है। सात हजार एकड़ में फैला यह एशिया के सबसे बड़े आयुध डिपो में एक है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस आग से कितना बड़ा नुकसान हो सकता था। गनीमत है कि दमकल कर्मियों और सेना के अधिकारियों की सूझ-बूझ से आग पर जल्दी ही काबू पा लिया गया। केवल एक बंकर में रखे गोला-बारूद को क्षति पहुंची। मगर इस हादसे में सेना के दो अधिकारियों समेत सोलह सैनिकों की मौत हो गई।

आग लगने की ठीक-ठीक वजह अभी पता नहीं चल पाई है, पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि या तो बिजली की चिनगारी उठने से ऐसा हुआ होगा, किसी की लापरवाही से सूखे गिरे पत्तों में आग गई होगी या फिर गरमी की वजह से बारूद सुलग उठा होगा। हालांकि आयुध डिपो में बिजली के शॉर्ट सर्किट के खतरे को टालने के लिए गंभीरता से ध्यान रखा जाता है। वहां ऐसी प्रकाश व्यवस्था की जाती है, जिसमें बिजली की चिनगारी उठने का खतरा प्राय: नहीं होता। इस डिपो में थोड़े दिन पहले कुछ मजदूरों को रखा गया था, हो सकता है कि उचित प्रशिक्षण न होने के कारण उनमें से किसी से कोई लापरवाही हो गई हो। फिर गरमी से बारूद के जल उठने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। कुछ मौकों पर ऐसा हो चुका है। आयुध डिपो में ज्यादातर साजो-सामान ऐसे स्थानों पर रखे जाते हैं, जहां गरमी से बचाव का माकूल इंतजाम नहीं होता, जबकि एंटी टैंक मिसाइल जैसे कुछ साजो-सामान को ठंडी जगह पर रखने की जरूरत होती है। अगर उन्हें देर तक गरम स्थान पर रखा जाए तो उनमें विस्फोट का खतरा बना रहता है। संभव है ऐसा ही कुछ हुआ हो।

असली वजह जांच के बाद पता चलेगी, पर सोचने की जरूरत है कि ऐसे हादसों पर रोक लगाने का क्या उपाय हो। इससे पहले भी कई आयुध डिपो में आग लग चुकी है, जिसके चलते सैकड़ों करोड़ का सैन्य साजो-सामान खाक हो चुका है। पुलगांव के जिस डिपो में आग लगी उसमें अंदाजा लगाया जा रहा है कि करीब दो सौ करोड़ रुपए का नुकसान हुआ होगा। जब एक बंकर में आग लगने से इतना बड़ा नुकसान हो सकता है तो पूरे डिपो में आग फैल जाए तो क्या हश्र होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है। आयुध डिपो में लगी आग पर काबू पाना आसान नहीं होता। चूंकि उसमें गोले-बारूद के फटने से जान जाने का खतरा होता है और बारूद की आग को टैंकरों से पानी फेंक कर रोकना संभव नहीं होता, इसलिए यह ज्यादा खतरनाक साबित होता है। इससे न सिर्फ आयुध डिपो परिसर में रहने और काम करने वाले लोगों के लिए, बल्कि आसपास के इलाकों को भी खतरा पैदा हो जाता है। डिपो में रखी कोई मिसाइल फटने के बाद कहां तक नुकसान पहुंचा सकती है, इसका अंदाजा नहीं होता। गनीमत है, इस आग से कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ। वैसे ही सैन्य साजो-सामान के लिए हमारी फौजों को प्राय: दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है, तिस पर अगर रखरखाव में लापरवाही के चलते वह बर्बाद हो जाए तो दोहरा नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए आयुध डिपो की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।

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