किसी भी समाज के सभ्य होने की कसौटी यह है कि वह अपने बीच परंपरा से चली आ रही वैसी कुप्रथाओं से किस हद तक मुक्ति हासिल कर पाता है, जो अमानवीय होने के साथ कानूनन अपराध भी हैं। मगर ऐसा लगता है कि हमारे देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को लेकर समाज एक तरह की उदासीनता में रहता है। नतीजतन, जहां आधुनिक मूल्यों के साथ हो रहे सामाजिक विकास के बीच महिलाओं के प्रति दुराग्रह और कुंठा की हिंसा की जगह पूरी तरह खत्म होनी चाहिए थी, वहां आज भी कई ऐसी परंपराएं मुखर दिखती हैं, जिनकी वजह से महिलाओं का जीवन-संघर्ष कई गुना बढ़ जाता है।

हालत यह है कि जिस दहेज जैसी समस्या के खिलाफ सबसे ज्यादा अभियान चले, बेहद सख्त कानूनी प्रावधान किए गए, उसकी वजह से आज भी अक्सर महिलाओं की जान जा रही है। अर्थव्यवस्था और विकास के चमकते आंकड़ों के बीच आखिर क्या ऐसा छूट रहा है कि न तो समाज अपनी ओर से इस विकृत परंपरा को छोड़ने के लिए संवेदनशील हो रहा है और न ही इस संबंध में बने सख्त कानूनों का खौफ दिखता है।

दरअसल, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में गिने जाने वाले नोएडा यानी गौतमबुद्ध नगर में दहेज उत्पीड़न के कारण एक महिला की मौत की खबर ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर किया है कि सामाजिक विकास की कसौटी पर हम कहां खड़े हैं और यह कितना अफसोसनाक है। कुछ ही दिन पहले भोपाल से भी दहेज की वजह से एक महिला की जान जाने की खबर आई थी। इन मामलों में महिला के परिवार वालों का स्पष्ट आरोप है कि शादी में भारी खर्च करने के बावजूद बाद के दिनों में भी दहेज की लगातार मांग पूरी न हो पाने की वजह से उनकी बेटी की हत्या कर दी गई और उसे आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की गई।

आए दिन सामने आने वाली ऐसी घटनाएं बताती हैं कि आम भारतीय परिवारों में दहेज की वजह से उत्पीड़न और हत्या की घटनाएं आज भी एक भयावह वास्तविकता बनी हुई हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के एक आंकड़े के मुताबिक अकेले 2022 में दहेज की वजह से 6,516 महिलाओं की मौत हुई थी।

माना जाता है कि परंपरा के नाम पर जारी कुछ अमानवीय कुप्रथाएं दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में समाज के वैसे हिस्से में चलन में होती हैं, जो किन्हीं वजहों से शिक्षा और प्रगतिशील मूल्यों से दूर रह गए या विकास के सफर में पिछड़ गए। मगर शायद यह बस एक धारणा है और दिल्ली, नोएडा या किसी बड़े महानगर में भी कई लोग कुरीतियों के निर्वाह को लेकर उतने ही संकीर्ण घेरे में जीते हैं।

यह समझना मुश्किल है कि उच्च शिक्षित और आधुनिक मूल्यों के साथ जीने वाले कथित संभ्रांत परिवारों के भीतर भी दहेज जैसी विकृत परंपरा के प्रति इतना मोह क्यों बचा हुआ है कि वे बहू के उत्पीड़न और कई बार हत्या कर देने की हद तक भी चले जाते हैं। विचित्र यह भी है कि ऐसे कई परिवार पहले से ही आर्थिक रूप से खासे समृद्ध होते हैं। इसके बावजूद उनके भीतर बहू के घर से धन हासिल करने की ऐसी अदम्य भूख होती है कि वे अपराध करने से भी नहीं हिचकते।

समस्या की जटिलता को समझे बिना अक्सर दहेज कानूनों के दुरुपयोग का सवाल उठाया जाता है, लेकिन आज भी दहेज की वजह से उत्पीड़न, आत्महत्या और हत्या की घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि इस मसले पर कड़ी कानूनी कार्रवाई से लेकर जनजागरूकता अभियानों की सख्त जरूरत है।

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ग्रेटर नोएडा के जलपुरा इलाके में रविवार को दीपिका नाम की महिला की मौत हो गई। महिला के परिजनों ने कहा है कि दहेज के कारण ससुराल वालों ने दीपिका की हत्या की है। दीपिका की शादी सिर्फ डेढ़ साल पहले हुई थी। परिजनों ने यह भी कहा है कि दीपिका के शरीर पर चोट के निशान थे। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक