इसमें कोई दोराय नहीं कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में भारतीय खिलाड़ियों ने अपने दमखम के बूते देश की प्रतिष्ठा को नया मुकाम दिया है। ऐसे कई खेल हैं, जिनमें अब तक सिर्फ अमेरिका, रूस, चीन आदि विकसित देशों की तूती बोलती रही है, लेकिन पिछले कुछ समय से भारत के खिलाड़ियों ने अपनी धमक से वर्चस्व की स्थिरता को तोड़ा है और अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज की है।

विडंबना यह है कि क्रमश: मजबूत होती मौजूदगी के बरक्स ऐसे मामले भी तेजी से बढ़ते पाए जाने लगे हैं, जिनमें हमारे खिलाड़ियों ने किसी ऐसी दवा या मादक पदार्थ का सेवन किया, जो डोपिंग से संबंधित नियमों के खिलाफ है। यही वजह है कि डोपिंग मामलों की जांच करने वाली संस्थाओं की नजर में भारत के खिलाड़ी अब विशेष रूप से निगरानी के दायरे में हैं।

गौरतलब है कि डोपिंग नियमों के उल्लंघन की वजह से निलंबित किए गए खिलाड़ियों की सूची में भारत अब कीनिया को पीछे छोड़ कर शीर्ष पर पहुंच गया है। भारत के ट्रैक एंड फील्ड के एक सौ अड़तालीस एथलीट और उनके सहयोगी कर्मचारी डोपिंग मामलों की वजह से निलंबित हैं।

सवाल है कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतिस्पर्धाओं का आयोजन कराने वाला समूचा तंत्र और खेल प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों के कामकाज की वह कौन-सी शैली है कि डोपिंग नियमों का उल्लंघन करने वाले खिलाड़ियों के निलंबन के मामले में देश सबसे ऊपर पहुंच गया। करीब चार महीने पहले भी निगरानी संस्था वैश्विक डोपिंग-रोधी एजंसी ने अपने आकलन में वर्ष 2024 के आंकड़ों में भारत को लगातार तीसरे साल डोपिंग के मामलों में सबसे ऊपर पाया था।

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में तमगा और उसके बाद नगद इनाम हासिल करने या फिर भविष्य में अपनी जगह सुनिश्चित करने की मंशा से कुछ खिलाड़ी प्रतिबंधित प्रदर्शन-वर्धक दवाएं लेने की ओर प्रवृत्त हो सकते हैं। मगर इससे उनकी सेहत और करिअर पर कितना और क्या विपरीत असर पड़ता है, इसके बारे में उन्हें शिक्षित और जागरूक किए जाने की जरूरत है।

हैरानी की बात यह है कि बीते कई वर्षों से यह समस्या कायम रहने के बावजूद इसमें सुधार के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, जिससे डोपिंग के नियमों के उल्लंघन पर काबू पाया जा सके।