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संपादकीयः उत्पात पर लगाम

कांवड़ यात्रा के दौरान हिंसा और उत्पात की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार किया है। ये घटनाएं न केवल समाज को शर्मसार करने वाली हैं, बल्कि प्रशासन और पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन कर उभरी हैं।

Author August 13, 2018 12:42 PM
कांवड़ यात्रा एक धार्मिक आयोजन है। यह शिव-भक्तों की आस्था का पर्व है। लेकिन जब आस्थावन भोले-भक्त ही ऐसे अराजक हालात पैदा करने लगें तो ऐसे आयोजन पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक ही है।

कांवड़ यात्रा के दौरान हिंसा और उत्पात की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार किया है। ये घटनाएं न केवल समाज को शर्मसार करने वाली हैं, बल्कि प्रशासन और पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन कर उभरी हैं। पिछले दिनों कांवड़ियों ने दिल्ली सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई शहरों में जिस तरह से हुड़दंग और उत्पात मचाया, तोड़फोड़ की और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, उससे आमलोगों में एक तरह का खौफ पैदा हो गया। मामूली-सी बात पर आम लोगों से मारपीट की घटनाओं की वजह से लोग सड़कों पर निकलने से बचते रहे। हर साल कांवड़ यात्रा के दौरान ऐसी घटनाएं सामने आती हैं और पुलिस लाचार बन कर देखती रहती है। प्रशासन पंगु साबित होता है। इस बार हद तो तब हो गई जब बुलंदशहर जिले में कांवड़ियों ने न सिर्फ पुलिसवालों को पीटा, बल्कि अगले साल पूरे थाने को निपटा देने की भी धमकी दे गए। बदायूं जिले में कांवड़ियों ने कुछ ट्रकों को आग लगा दी। दिल्ली में एक कार कावंड़ से जरा-सी छू क्या गई, देखते ही देखते कांवड़ियों ने डंडों से उस पर इतने वार किए कि कार चकनाचूर हो गई। कार सवार ने भाग कर जान बचाई। सवाल है कि इस तरह की हिंसा करने वाले क्या सच्चे शिवभक्त हैं?

कांवड़ यात्रा एक धार्मिक आयोजन है। यह शिव-भक्तों की आस्था का पर्व है। लेकिन जब आस्थावन भोले-भक्त ही ऐसे अराजक हालात पैदा करने लगें तो ऐसे आयोजन पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक ही है। कांवड़ यात्रा को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए पूरा प्रशासनिक और पुलिस अमला लगता है। कानून-व्यवस्था के मद्देनजर सरकारें भी सक्रिय रहती हैं। कांवड़ियों की भरपूर सेवा के लिए नागरिक संगठन हर तरह से दिल खोलकर मदद करते हैं। लेकिन पीड़ा तब होती है जब कांवड़ियों का हुजूम शर्मनाक हरकतें करने लगता है। कई जगह तो कांवड़ियों के गुटों में ही संघर्ष होने की खबरें आई हैं। दरअसल, ऐसी घटनाओं के पीछे असामाजिक तत्वों का हाथ रहता है। अपराधी-वृत्ति के लोग ऐसे आयोजनों में अपना काम करते हैं। हालांकि सारे कांवड़ यात्री ऐसे नहीं होते। पर इस तरह की घटनाओं से हर शिव-भक्त की छवि तो बिगड़ती है। कांवड़ यात्रा की वजह से हरिद्वार से दिल्ली के बीच दस दिन तक एक तरह का अघोषित कर्फ्यू लग जाता है और यह आम लोगों के लिए एक यातना-भरे दौर से कम नहीं होता।

सवाल है उत्पाती कांवड़ियों पर कार्रवाई हो तो कैसे? यह तो दिल्ली पुलिस ने हिम्मत दिखाई और पूरी मुस्तैदी के साथ सीसीटीवी कैमरों से उन लोगों को खोज निकाला जिन्होंने कार पर हमला किया था। दिल्ली की घटना में जो कांवड़िया पकड़ा गया है वह आपराधिक पृष्ठभूमि का है। लेकिन ज्यादातर मामलों में पुलिस कोई कदम उठाने से बचती है क्योंकि उसे खुद इस बात का खौफ रहता है कि कांवड़ियों का झुंड कहीं बेकाबू होकर हिंसक न हो जाए। उसकी कोशिश यही रहती है कि जैसे-तैसे यात्रा निपट जाए। दुख की बात यह है कि कांवड़ियों की यह अराजक संस्कृति हाल के वर्षों में पनपी है। कांवड़ यात्रा को पवित्र और सुरक्षित बनाने की समाज की भी जिम्मेदारी होनी चाहिए। कांवड़ में जाने वाले समूहों को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आपराधिक तत्वों को शरीक न होने दें, वरना आस्थावानों का यह पवित्र आयोजन असामाजिक तत्वों की मौज का जरिया बन जाएगा और आमजन के लिए समस्याएं खड़ी करेगा। इस पर लगाम लगना जरूरी है।

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