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व्यापार की कूटनीति

उदारीकरण के जमाने में दो देशों के बीच कारोबारी संबंधों में निजी क्षेत्र की भूमिका धीरे-धीरे ज्यादा अहम होती गई है। अलबत्ता इसके लिए कूटनीतिक सहूलियतें..

Author नई दिल्ली | November 15, 2015 10:16 PM

उदारीकरण के जमाने में दो देशों के बीच कारोबारी संबंधों में निजी क्षेत्र की भूमिका धीरे-धीरे ज्यादा अहम होती गई है। अलबत्ता इसके लिए कूटनीतिक सहूलियतें बढ़ाना और नियम-कायदों को आसान बनाना सरकारों की पहल के बगैर नहीं हो सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन दिवसीय ब्रिटेन यात्रा में ये दोनों पहलू अहम थे। उनके लंदन रवाना होने से पहले उनकी सरकार ने रक्षा और रीयल एस्टेट सहित पंद्रह क्षेत्रों में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने तथा शर्तों को और उदार बनाने की घोषणा की। किसी भी अन्य यूरोपीय देश के मुकाबले ब्रिटेन से भारत का कोराबार ज्यादा रहा है। भारत में ब्रिटेन सबसे बड़ा यूरोपीय निवेशक है। इसी तरह यूरोप में भारत का सबसे ज्यादा निवेश ब्रिटेन में ही है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि सरकार के ताजा फैसले से ही ब्रिटेन के उद्योग जगत ने भारत में दिलचस्पी दिखाई।

हां, इस फैसले ने उनका उत्साह बढ़ाया होगा। मोदी भी चाहते थे कि आपसी संवाद दोनों प्रधानमंत्रियों और सरकारी प्रतिनिधियों तक सीमित न रहे बल्कि दोनों तरफ के उद्योग-व्यापार जगत के नुमाइंदे भी इस मौके पर बातचीत करें। लिहाजा, पुनर्गठित भारत-ब्रिटेन सीईओ फोरम की पहली बैठक हुई। स्मार्ट सिटी, शिक्षा और कौशल, इंजीनियंरिग, रक्षा, स्वास्थ्य सेवा और वित्तीय पेशेवर सेवा के रूप में छह ऐसे विषय चिह्नित किए गए जिनमें आपसी सहयोग को आगे बढ़ाया जाना है। शीर्ष कारोबारी प्रमुखों के साथ मोदी की बातचीत से उत्साह का माहौल बना है जिसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत में निवेश के बहुत-से प्रस्ताव सामने आए हैं। मोबाइल फोन और बैंकिंग से लेकर अक्षय ऊर्जा, चिकित्सा, शिक्षा और तकनीक जैसे अनेक क्षेत्रों में ब्रिटेन की कंपनियों की तरफ से भारी निवेश की संभावना बनी है।

समस्या यह है कि कारोबारी सहूलियत के लिहाज से आज भी भारत की गिनती अव्वल देशों में नहीं होती। इसकी कुछ झलक मोदी से ब्रिटेन के उद्योगपतियों की मुलाकात में भी दिखी। मोदी ने भारत को निवेश के लिए सबसे उपयुक्त जगह बताते हुए निवेश का न्योता दिया, तो ब्रिटेन के कारोबारियों ने भारत में अधिक पारदर्शिता बरते जाने की मांग उठाई और बाहरी कंपनियों के साथ समान व्यवहार करने की जरूरत पर जोर दिया। दरअसल, बहुराष्ट्रीय कंपनियां चाहती हैं कि भारत अपने पेटेंट कानूनों में बदलाव करे।

मोदी ने आश्वस्त किया कि उनकी सरकार उद्यमियों के बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और इस दिशा में एक व्यापक नीति को अंतिम रूप देने में जुटी है। पर पेटेंट समेत कई मामले ऐसे हैं जिन पर सरकार को राजनीतिक आम सहमति बनाने की चुनौती से जूझना पड़ सकता है। रक्षा क्षेत्र में एफडीआइ की सीमा बढ़ाने के फैसले पर कांग्रेस के अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय मजदूर संघ ने भी नाराजगी जताई है। इसी तरह पेटेंट संबंधी नियमों में जिस बदलाव की ओर सरकार ने संकेत किया है उसे लेकर भी विवाद खड़ा हो सकता है। असल में, कई क्षेत्र ऐसे हैं जिनसे संबंधित नियम-कायदों में फेरबदल करते समय काफी सावधानी की जरूरत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसे प्रस्तावों को अंतिम रूप देते समय इस तकाजे को ध्यान में रखा जाएगा।

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