देश में महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक में किराए पर मकान देने का एक बहुत बड़ा उद्योग खड़ा हो गया है। जहां जगह मिले, वहां बहुमंजिला इमारतें बना दी जाती हैं। सरकारी दस्तावेजों में भले ही ऐसी इमारतें आवासीय श्रेणी में पंजीकृत होती हैं, लेकिन इनमें से कई में पेइंग गेस्ट (पीजी), होटल और रेस्तरां संचालित किए जाते हैं। जब ये इमारतें जर्जर हो जाती हैं, तो कई दफा भरभराकर गिर जाती हैं या इनमें आग लगने के हादसे होते हैं। ऐसी घटनाओं में एफआइआर दर्ज होती है, उसके बाद कुछ इमारतों पर सीलिंग या तोड़फोड़ की कार्रवाई होती है और बाद में सब कुछ फिर उसी ढर्रे पर लौट आता है।

हादसों की कड़ियों में बीते रविवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर के पास स्थित सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत के ढहने की घटना भी शामिल हो गई है, जिसमें विद्यार्थियों समेत सात लोगों की मौत हो गई। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ये सब कैसे हो रहा है, बल्कि यह भी है कि कौन है, जो ऐसा होने दे रहा है?

हाल के दिनों में देश भर में जर्जर इमारतों के गिरने या आग लगने के कई हादसे सामने आ चुके हैं। बीते जून में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के मालवीय नगर में एक होटल में आग से बाईस लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश में लखनऊ के अलीगंज स्थित एक व्यावसायिक इमारत में आग की घटना में विद्यार्थियों समेत पंद्रह लोगों की जान चली गई थी।

खबरों के मुताबिक, सत्य निकेतन में जिस इमारत के गिरने से हादसा हुआ, वह काफी पुरानी थी और जर्जर हालत में थी। इसके बावजूद उसे पीजी के तौर पर किराए पर दिया गया था। जब हादसा हुआ, उस वक्त वहां भूतल पर मरम्मत कार्य चल रहा था। यानी वहां रहने वाले विद्यार्थियों की जान को जानबूझकर जोखिम में डाला गया। पुलिस ने भले ही इमारत के मालिक को गिरफ्तार कर लिया है और सरकार ने संबंधित पांच अधिकारियों को निलंबित कर दिया है, लेकिन क्या इस कार्रवाई से यह सुनिश्चित हो पाएगा कि भविष्य में ऐसे हादसे की पुनरावृत्ति नहीं होगी?

सवाल सिर्फ किसी एक घटना का नहीं है, बल्कि देश भर में उन हजारों जर्जर इमारतों का है, जिनका नियमों को धता बताकर व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा रहा है। बड़े शहरों में किसी इमारत का नक्शा पास होने से लेकर उसके बनने तक एक लंबी विभागीय प्रक्रिया होती है। कई स्तर पर जांच होती है, तब जाकर उसके इस्तेमाल की अनुमति दी जाती है। इसके बाद भी समय-समय पर उसकी जांच करने का प्रावधान है और अगर वह जर्जर हालत में पाई जाती है, तो उसे असुरक्षित घोषित किया जाता है।

इसके बावजूद अगर नियमों की अनदेखी की जाती है, तो इसे सांठगांठ का तंत्र नहीं तो और क्या कहा जाएगा। दिल्ली सरकार अब पीजी सुरक्षा नीति लाने की तैयारी कर रही है। हालांकि राजधानी में इस तरह के प्रयास वर्ष 1993 से जारी हैं, लेकिन अभी तक ठोस नियम जमीनी स्तर पर लागू नहीं हो पाए हैं। पीजी में रहने वालों से मोटी रकम किराए में वसूली जाती है, लेकिन उनकी सुरक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। सरकार को इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि सिर्फ नीति या कानून बना देने से समस्या हल नहीं हो सकती, जरूरत उन्हें कड़ाई से अमल में लाने की है।