ताज़ा खबर
 

संपादकीयः पद की गरिमा

राज्यपालों के दायित्व को लेकर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जो राय जाहिर है, उसे पिछले काफी समय से इस मसले पर गाहे-बगाहे उठने वाले विवादों के आलोक में देखा जा सकता है।

Author Published on: February 11, 2016 3:15 AM
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

राज्यपालों के दायित्व को लेकर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जो राय जाहिर है, उसे पिछले काफी समय से इस मसले पर गाहे-बगाहे उठने वाले विवादों के आलोक में देखा जा सकता है। दरअसल, कुछ राज्यपालों के बयान और फैसलों से हाल में जिस तरह के विवाद खड़े हुए, उसे इस पद की गरिमा के अनुकूल नहीं माना गया। शायद इसी के मद्देनजर राज्यपालों के दो दिवसीय सम्मेलन में मंगलवार को राष्ट्रपति ने कहा कि संवैधानिक पदों का निर्वाह कर रहे लोग संविधान की पवित्रता बरकरार रखें।

जाहिर है, संवैधानिक तौर पर राज्यपालों के अधिकार क्षेत्र में जो काम निर्धारित किए गए हैं, अगर उन्हें ठीक से निबाहा जाए तो कुछ असहज स्थितियों से बचा जा सकता है। अगर किसी राज्यपाल के सार्वजनिक बयान या फैसले की वजह से कोई अप्रिय स्थिति बनती है, तो इससे न सिर्फ उस पद की जिम्मेदारी और अधिकारों की सीमा से जुड़े सवाल पैदा होते हैं, बल्कि संविधान की गरिमा भी भंग होती है। इसलिए राष्ट्रपति की सलाह उचित है कि हमारे संविधान में शामिल सिद्धांतों के दृढ़तापूर्वक अनुपालन की वजह से यह देश मजबूत बना है; संविधान चिरस्थायी दस्तावेज है। निश्चित रूप से राष्ट्रपति की यह सलाह उन सभी घटनाओं की पृष्ठभूमि में सामने आई है, जिनसे संवैधानिक सीमा से इतर व्यवहार में राज्यपालों की भूमिका कठघरे में खड़ी हुई। खासकर अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल जेपी राजखोवा की रिपोर्ट के आधार पर जिस तरह राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया गया और उससे उपजे विवाद का मामला सुप्रीम कोर्ट में गया, उसके मद्देनजर प्रणब मुखर्जी की सलाह प्रासंगिक है।

राज्यपाल के पद को संवैधानिक दर्जा हासिल है और उनके दायित्व और अधिकार क्षेत्र भी निर्धारित हैं। लेकिन अक्सर ऐसे मामले आते रहे हैं, जिनमें किसी राज्यपाल के बयान से बेवजह का विवाद पैदा हो गया और इस पद से जुड़े अधिकारों की सीमा पर सवाल उठे। मसलन, कुछ समय पहले संवैधानिक तौर पर भारत की धर्मनिरपेक्षता के बरक्स असम और त्रिपुरा के राज्यपालों ने जिस तरह देश को हिंदू समुदाय से जोड़ कर अपने विचार जाहिर किए, वह न सिर्फ संवैधानिक मूल्यों को धता बताने, बल्कि यहां के सामुदायिक सद्भाव की लंबी परंपरा को भी नुकसान पहुंचाने वाला था। स्वाभाविक ही इस पर संविधान में दर्ज दायित्वों से इतर बिना संदर्भ के विचार जाहिर करने से बेवजह विवाद हुआ। जबकि राज्यपाल चाहें तो एक संवैधानिक प्रतीक होने के अलावा संबंधित राज्य में उनके लिए कई ऐसे काम हैं, जिनमें उनकी भूमिका काफी अहम साबित हो सकती है।

राष्ट्रपति ने एक तरह से याद दिलाया है कि इस समय राज्यों में तीन सौ बीस से ज्यादा सरकारी और करीब डेढ़ सौ निजी विश्वविद्यालय हैं। राज्यपाल इन संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए एक प्रेरक की भूमिका निभा सकते हैं। यह छिपी बात नहीं है कि केंद्र सरकार में शामिल राजनीतिक दलों ने राज्यपाल पद को समय-समय पर एक तरह से अपने राजनीतिक हित साधने का जरिया बनाया है। अपने अनुकूल राज्यपालों के सहारे विपक्षी दलों के शासन वाली राज्य सरकारों को कई बार गैर-वाजिब वजहों से भी बाधित करने की कोशिश की की गई। लेकिन इससे इस पद की छवि और विश्वसनीयता को जो नुकसान पहुंचा, उसका नतीजा यह सामने आया कि अब राज्यपाल को कई बार केंद्र में सत्ता पक्ष की पार्टी के प्रतिनिधि के तौर पर देख लिया जाता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories