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संपादकीयः सदन की मर्यादा

देश की संसद और राज्यों के विधानमंडलों में अगर जनता से जुड़े मुद्दे पर विचार-विमर्श करने, समस्याओं का हल निकालने और जनहित में नीतियां बनाने के क्रम में जनप्रतिनिधियों के बीच तीखी बहसें भी होती हैं, तो यह स्वाभाविक और जरूरी है।

Author September 13, 2018 3:55 AM
हरियाणा विधानसभा में जिन नेताओं के बीच अपशब्दों और आक्रामक व्यवहार के ऐसे दृश्य सामने आए, उन्हें सदन का वरिष्ठ सदस्य माना जाता है और किसी भी स्थिति में उनसे परिपक्व आचरण की अपेक्षा की जाती है।

देश की संसद और राज्यों के विधानमंडलों में अगर जनता से जुड़े मुद्दे पर विचार-विमर्श करने, समस्याओं का हल निकालने और जनहित में नीतियां बनाने के क्रम में जनप्रतिनिधियों के बीच तीखी बहसें भी होती हैं, तो यह स्वाभाविक और जरूरी है। लेकिन अगर इस दौरान एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप बदजुबानी या गाली-गलौज में तब्दील हो जाते हैं और हिंसा तक के हालात पैदा हो जाते हैं तो यह न केवल संसदीय परंपराओं के खिलाफ है, बल्कि इससे लोकतंत्र को भी नुकसान पहुंचता है। इस लिहाज से देखें तो हरियाणा विधानसभा में मंगलवार को दो दलों के नेताओं के बीच जिस तरह अपशब्दों प्रयोग किया गया और मारपीट तक की नौबत आई, उससे लोकतांत्रिक मर्यादा को गहरी चोट पहुंची है। इससे किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि कांग्रेस विधायक करण सिंह दलाल ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान राज्य में गरीबों को राशन नहीं मिल पाने का मुद्दा उठाया। लेकिन जब उन्होंने इस वजह से देश भर के राज्यों में हरियाणा की पहचान ‘कलंकित’ प्रदेश के रूप में होने की बात कही तो दूसरे कई सदस्यों को यह नागवार गुजरी और उन्होंने इसे राज्य के आत्मसम्मान पर चोट बताया।

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अगर अन्य सदस्यों ने इसे राज्य के अपमान के रूप में देखा तो उस पर आपत्ति जाहिर करना उनका अधिकार है। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि इस क्रम में दोनों तरफ से ऐसी भाषा का इस्तेमाल क्यों हुआ, जिसने ज्यादा अफसोसनाक हालात पैदा कर दिए। तीखे शब्दों से आगे गाली-गलौज की भाषा से उपजी स्थिति यहां तक पहुंच गई कि करण सिंह दलाल और इंडियन नेशनल लोकदल के नेता अभय सिंह चौटाला ने एक दूसरे पर जूता उठा लिया। इसके बाद सदन की कार्यवाही के तहत कांग्रेस सदस्य को एक साल के लिए विधानसभा से निलंबित कर दिया गया। लेकिन इस प्रकरण से यही जाहिर होता है कि हमारे जनप्रतिनिधियों को सदन की कार्यवाही के दौरान अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखने की जरूरत है। गरीबों को राशन नहीं मिल पाना वास्तव में एक गंभीर समस्या है और इस मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगा जाना किसी भी जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी होनी चाहिेए। लेकिन क्या इसके लिए ऐसी भाषा के प्रयोग से नहीं बचा जा सकता है, जिससे राज्य की छवि को नुकसान पहुंचता है? दूसरी ओर, अगर किसी सदस्य ने आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया तो उस पर लोकतांत्रिक तरीके से आपत्ति जताने और उसे सदन की कार्यवाही से हटाने की मांग करने के बजाय अपशब्दों के साथ हंगामा करना और जूता निकाल लेना कितना उचित है?

हरियाणा विधानसभा में जिन नेताओं के बीच अपशब्दों और आक्रामक व्यवहार के ऐसे दृश्य सामने आए, उन्हें सदन का वरिष्ठ सदस्य माना जाता है और किसी भी स्थिति में उनसे परिपक्व आचरण की अपेक्षा की जाती है। सवाल है कि अपने लंबे राजनीतिक जीवन और सदन का सदस्य होने के बावजूद लोकतंत्र और मर्यादा उनके सार्वजनिक व्यवहार का हिस्सा क्यों नहीं बन पाए! हालांकि सदन में हिंसा या अपशब्दों के इस्तेमाल का यह अकेला उदाहरण नहीं है। उत्तर प्रदेश, ओड़िशा और बिहार सहित अन्य राज्यों से भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जब किसी मसले पर होने वाली बहस ने आपसी मतभेद को इस कदर अराजक शक्ल में सामने खड़ा कर दिया कि बाकायदा सदन में दो पक्षों ने एक दूसरे के खिलाफ जम कर हिंसा की। सदन बहस और जन-सरोकार के मसले उठाने का मंच है, न कि बाहुबल के प्रदर्शन का। अगर ऐसी जगहों पर भी जनता के नुमाइंदे आक्रामक और हिंसक बर्ताव करने लगेंगे तो यह हमारे संसदीय लोकतंत्र के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होगा।

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