आज के तकनीकी दौर में प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल हर किसी के लिए एक जरूरत बन गया है। ऐसे में डिजिटल सुविधाओं ने भले ही हमारे कई कार्यों को आसान बना दिया है और सूचना के प्रवाह को तेज कर दिया है, लेकिन इससे उपजे खतरों में निजता की रक्षा का मसला भी गंभीर है। अब ज्यादातर हाथों में स्मार्ट मोबाइल है और इंटरनेट की सुलभता ने सोशल मीडिया तक पहुंच को आसान बना दिया है।

मगर, डिजिटल साक्षरता के अभाव में बहुत कम लोग यह समझ रखते हैं कि सोशल मीडिया से जुड़ने के लिए वे जो निजी जानकारी संबंधित मंच के साथ साझा करते हैं, वह उनकी सहमति के बिना किसी तीसरे पक्ष को उपलब्ध कराई जा सकती है या उसका दुरुपयोग किया जा सकता है। इसी तरह के एक मामले में सर्वाेच्च न्यायालय ने मंगलवार को ‘मेटा प्लेटफार्म्स इंक’ और ‘वाट्सऐप’ को कड़ी फटकार लगाई। साथ ही कहा कि कोई भी कंपनी या मंच निजी जानकारी साझा करने के नाम पर नागरिकों की निजता के अधिकार से खिलवाड़ नहीं कर सकते।

गौरतलब है कि आज एक मोबाइल नंबर लेने से लेकर बैंक में खाता खुलवाने तक, हर जगह संबंधित व्यक्ति को अपनी निजी जानकारी साझा करनी पड़ती है। कुछ मामलों में तो बायोमेट्रिक पहचान अनिवार्य है, अगर वह तीसरे पक्ष के हाथ लग जाए तो और भी कई तरह के जोखिम पैदा हो सकते हैं।

यानी एक व्यक्ति की निजी जानकारी इतनी जगह चली जाती है कि वह तीसरे पक्ष के साथ कहां से साझा की गई, इसका पता लगाना भी मुश्किल हो जाता है। सोशल मीडिया मंच पर भी यह जोखिम बना रहता है, क्योंकि ज्यादातर उपयोगकर्ता उनके नियम-शर्तों से अनभिज्ञ होते हैं।

शीर्ष अदालत ने भी इस पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि गोपनीयता संबंधी शर्तें इतनी चालाकी से तैयार की जाती हैं कि आम व्यक्ति उन्हें समझ ही नहीं सकता। यह निजी जानकारी की चोरी करने का एक सभ्य तरीका है और इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। व्यक्तिगत पहचान सुनिश्चित करने और गैर कानूनी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए निजी जानकारी की जरूरत की दलील दी जाती है, लेकिन निजता के अधिकार का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।