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संपादकीय: संकट और चुनौतियां

विषाणुरोधी टीकों का परीक्षण काफी जटिल प्रक्रिया से गुजरता है, खासकर कोविड-19 जैसे विषाणु का टीका तैयार करना काफी चुनौतीपूर्ण काम है। इसमें एक भी चरण में बाधा पहुंचती है या किसी भी तरह का प्रतिकूल प्रभाव नजर आता है, तो वह टीका बनाने वालों के लिए चेतावनी की तरह होता है। हालांकि वैज्ञानिक परीक्षणों में विफलताएं हमेशा एक नया और बेहतर कदम बढ़ाने का अवसर देती हैं, इसलिए इस विफलता को लेकर बहुत निराश होने की बात नहीं है। पर यह अवश्य हुआ है कि इससे कोरोना पर काबू पाने में कुछ विलंब होगा।

Testकोरोना वायरस को लेकर देश में संकट। फाइल फोटो।

कोरोना से पार पाने की राह में मुश्किलें आसान होती नजर नहीं आ रहीं। एक तरफ कई राज्यों में फिर से इसका संक्रमण तेजी से फैल रहा है, तो दूसरी ओर इसके टीके आने में बाधा पड़ रही है। उम्मीद की जा रही थी कि इस साल के अंत तक इसका कोई टीका आ जाएगा और जल्दी ही इस संकट से निजात मिल सकेगी।

मगर आॅक्सफर्ड के टीके को लेकर जिस तरह विवाद खड़ा हो गया है, उससे लगता है कि इसके बाजार में आने में अभी वक्त लग सकता है। आॅक्सफर्ड के कोरोना टीके का परीक्षण रोक देना पड़ा है। दरअसल, जिन कुछ लोगों पर इस टीके का परीक्षण किया जा रहा था, उनमें से एक व्यक्ति के ऊपर इसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया देखी गई है।

हालांकि और भी कंपनियां कोरोना टीके का परीक्षण कर रही हैं और सबका दावा है कि इस साल के अंत या फिर अगले साल की शुरुआत तक वे उन्हें बाजार में उतार सकेंगी। मगर आॅक्सफर्ड टीके को लेकर लोगों को सबसे अधिक उम्मीद बनी हुई थी। करोड़ों लोगों को इससे लाभ मिलने का अनुमान है। अब उसके विवादों में घिर जाने से स्वाभाविक ही दूसरे टीकों के परीक्षणों पर संदेह उठेगा।

विषाणुरोधी टीकों का परीक्षण काफी जटिल प्रक्रिया से गुजरता है, खासकर कोविड-19 जैसे विषाणु का टीका तैयार करना काफी चुनौतीपूर्ण काम है। इसमें एक भी चरण में बाधा पहुंचती है या किसी भी तरह का प्रतिकूल प्रभाव नजर आता है, तो वह टीका बनाने वालों के लिए चेतावनी की तरह होता है। हालांकि वैज्ञानिक परीक्षणों में विफलताएं हमेशा एक नया और बेहतर कदम बढ़ाने का अवसर देती हैं, इसलिए इस विफलता को लेकर बहुत निराश होने की बात नहीं है। पर यह अवश्य हुआ है कि इससे कोरोना पर काबू पाने में कुछ विलंब होगा।

भारत जैसे सघन आबादी और लचर स्वास्थ्य सुविधाओं वाले देश में कोरोना बहुत बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई जगह लगता है कि सरकारें इस पर काबू पाने की कोशिश करते-करते थक-सी गई हैं। जांचों में शिथिलता दिखाई देने लगी है। जहां जांचें कम हो रही हैं, वहां संक्रमितों की सही संख्या भी नहीं पता चल पा रही। इस तरह कई जगह मान लिया गया है कि वहां कोरोना संक्रमण उतार पर है।

मगर जहां जांचों में तेजी आई है, वहां के आंकड़े चिंताजनक हैं। दिल्ली और महाराष्ट्र में स्थिति ज्यादा खराब है। हालांकि मरने वालों की संख्या में कुछ कमी दर्ज हुई है, पर यह संतोष की बात नहीं। दिल्ली में जिस तरह नए सिरे से संक्रमण बढ़ा है, उससे दूसरे राज्यों को सबक लेने की जरूरत है।

बंदी के बाद बाजार और व्यावसायिक गतिविधियां खुल गई हैं। अपेक्षा की गई थी कि लोग खुद सावधानी बरतेंगे और संक्रमण को फैलने से रोकने में सहयोग करेंगे, मगर वह उम्मीद बेमानी साबित हुई। लोग शायद भुला बैठे हैं कि कोरोना का भय अभी समाप्त नहीं हुआ है। बिना नाक-मुंह ढंके और उचित दूरी का ध्यान रखे खुलेआम बाहर निकल रहे हैं, जगह-जगह भीड़भाड़ लगा रहे हैं।

इसे देखते हुए दिल्ली में मास्क न पहनने वालों पर जुर्माने की राशि चार गुना बढ़ी दी गई। अब उपराज्यपाल ने कहा है कि भीड़भाड़ लगाने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। कई जगह आंशिक बंदी की गई है। ऐसे में दूसरे शहरों-कस्बों के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्या स्थिति होगी। कोरोना टीके के परीक्षण में देर लग रही है, इसलिए सरकारों से अधिक सतर्कता और सक्रियता की अपेक्षा की जाती है।

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