राहत के बावजूद

लखनऊ में आयोजित जीएसटी परिषद की पैंतालीसवीं बैठक संपन्न हो गई।

सांकेतिक फोटो।

लखनऊ में आयोजित जीएसटी परिषद की पैंतालीसवीं बैठक संपन्न हो गई। कयास लगाए जा रहे थे कि इसमें पेट्रोल, डीजल को भी जीएसटी के दायरे में लाने का फैसला हो सकता है। इसके लिए मद्रास उच्च न्यायालय ने निर्देश भी दिए थे। इसलिए उम्मीद जताई जा रही थी कि र्इंधन तेलों पर सरकार ऐसा फैसला कर सकती है। यह प्रस्ताव बैठक में रखा भी गया था, मगर कई राज्यों ने इसका विरोध किया, जिसकी वजह से इस संबंध में कोई फैसला नहीं किया जा सका। खुद केंद्रीय वित्तमंत्री ने माना भी कि र्इंधन तेलों को जीएसटी के दायरे में लाने का यह सही वक्त नहीं है। अगर ऐसा हो जाता, तो पेट्रोल डीजल की कीमतों में पच्चीस से तीस रुपए के बीच कमी आ सकती थी। मगर अभी न तो यह फैसला राज्य सरकारों के अनुकूल साबित होता और न केंद्र के। जीएसटी को लागू हुए चार साल हो चुके हैं, मगर अभी तक इसे लेकर उलझनें समाप्त नहीं हो सकी हैं। यही वजह है कि थोड़े-थोड़े अंतराल पर इसकी समीक्षा के लिए बैठकें बुलानी पड़ती हैं। राज्यों के हिस्से के जीएसटी भुगतान को लेकर भी अक्सर तनातनी का वातावरण बना रहता है। ऐसे में सरकार खुद भी अभी पेट्रोल, डीजल को इस दायरे में लाने के पक्ष में नहीं थी।

मगर इस बैठक में बायोडीजल पर जीएसटी बारह प्रतिशत से घटा कर पांच प्रतिशत कर दिया गया है। निस्संदेह इससे लोगों को कुछ राहत मिलेगी। इसके अलावा कोविड के उपचार में काम आने वाली ग्यारह दवाओं पर जीएसटी की दर बारह से घटा कर पांच प्रतिशत रखने के फैसले को इस साल के दिसंबर तक जारी रखने पर सहमति बनी है। कैंसर की कई महंगी दवाओं और दिव्यांगों के वाहनों पर जीएसटी की दर घटा कर बारह से पांच फीसद कर दी गई है। कुछ महंगी जीवनरक्षक दवाओं पर भी जीएसटी घटा दी गई है। इससे स्वाभाविक ही लाखों लोगों को काफी राहत मिलेगी। कुछ वस्तुओं पर करों की दरें बढ़ाई भी गई हैं। मसलन, रेल के कल-पुर्जों पर जीएसटी बारह के बढ़ा कर अठारह फीसद कर दी गई है। माना जा रहा था कि घर-घर भोजन पहुंचाने वाली कंपनियों की सेवाओं को भी रेस्तरां की तरह माना जाएगा और उन पर जीएसटी लगाई जाएगी, मगर फिलहाल ऐसा कोई फैसला टाल दिया गया है और उन्हें पहले की तरह करों का भुगतान करना पड़ेगा।

माना गया था कि जीएसटी लागू होने के तीन साल के भीतर करों की दरें स्थिर हो जाएंगी और फिर राज्यों का घाटा समाप्त हो जाएगा। मगर ऐसा नहीं हो पाया है। चार साल बाद भी वस्तुओं पर करों की दरों को लेकर विचार-विमर्श करना पड़ रहा है। इसकी बड़ी वजह यह है कि शुरू में ही करों की दरें तय करते समय व्यावहारिक रास्ता अख्तियार नहीं किया गया था। जीएसटी लागू करने के पीछे बुनियादी संकल्प यह था कि वस्तुओं पर किसी भी रूप में करों की दर अठारह फीसद से ऊपर नहीं रखी जाएगी। मगर इतनी बैठकों के बाद भी अभी अनेक वस्तुओं पर जीएसटी इससे कहीं अधिक है। फिर राज्यों को होने वाला घाटा समाप्त होना तो दूर, जीएसटी उगाही के अब तक व्यवस्थित न हो पाने की वजह से राज्यों को मिलने वाला हिस्सा संतोषजनक ढंग से भुगतान नहीं किया जा पाता। इसे लेकर राज्य सरकारें समय-समय पर आवाज उठाती रहती हैं। जीएसटी को सुचारु और व्यावहारिक बनाने की चुनौतियां अभी समाप्त नहीं हुई हैं।

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