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पाबंदी के बावजूद

बढ़ते कोरोना संक्रमण के मद्देनजर निर्वाचन आयोग ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में रैलियों और सड़क पर शक्ति प्रदर्शन पर पाबंदी एक हफ्ते के लिए और बढ़ा दी है।

बढ़ते कोरोना संक्रमण के मद्देनजर निर्वाचन आयोग ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में रैलियों और सड़क पर शक्ति प्रदर्शन पर पाबंदी एक हफ्ते के लिए और बढ़ा दी है। राजनीतिक दल वर्चुअल यानी इंटरनेट के माध्यम से मतदाताओं से संपर्क कर सकते हैं। अगर कहीं बैठक करनी भी हो तो अधिकतम तीन सौ या हाल की पचास प्रतिशत क्षमता तक की संख्या रखी जा सकती है। यह एक अच्छा निर्णय है। पिछली बार जिस तरह कोनोना संक्रमण के समय उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव कराए गए और उसके चलते भारी संख्या में मौतें हुर्इं, वैसा अनुभव फिर से न दुहराया जा सके, इसलिए यह सख्ती बहुत जरूरी है।

मगर राजनीतिक दल इस पर कितना अमल करेंगे, देखने की बात है। चुनाव की तारीखें घोषित करते समय ही निर्वाचन आयोग ने पंद्रह जनवरी तक रैलियों पर रोक लगा दी थी। मगर फिर भी कई राजनेता रैलियां करते देखे गए। अभी एक दिन पहले ही, जब भाजपा छोड़ कर आए नेता सपा में औपचारिक रूप से शामिल हुए, तो निर्वाचन आयोग के निर्देशों की धज्जियां उड़ती दिखीं। सभा स्थल पर किसी तरह की एहतियात नहीं बरती गई। भीतर धक्कामुक्की थी, तो बाहर सड़क पर सपा समर्थकों का सैलाब उमड़ा हुआ था। उसे लेकर प्राथमिकी भी दर्ज कराई गई है। ऐसे में राजनीतिक दल आगे ऐसा नहीं करेंगे, कहना मुश्किल है।

दरअसल, वर्चुअल रैली करने में राजनीतिक दलों की मुश्किलें भी समझी जा सकती हैं। राजनेता जब तक भीड़ के सामने उपस्थित होकर जैकारा नहीं सुन लेते, तब तक उन्हें संतोष नहीं होता। चुनावी रैलियां और सड़क पर हुजूम जुटा कर वे प्रतिद्वंद्वी दलों के सामने अपनी ताकत का प्रदर्शन भी करते हैं। वर्चुअल रूप से संबोधित करने में वह सुख और संतोष नहीं मिल पाता। आमने-सामने का लोभ बना रहता है। फिर एक कठिनाई यह भी है कि वर्चुअल रैली करने की व्यवस्था करना हर दल के वश की बात नहीं है।

इसके लिए जगह-जगह बड़े परदे लगाने होंगे, इंटरनेट के माध्यम से उन परदों से जुड़ना होगा। इसके लिए खासे तकनीकी सरंजाम की जरूरत होगी। फिर दलों के हर समर्थक के पास स्मार्टफोन और इंटरनेट की सुविधा नहीं है कि वे अपने नेता के भाषण सुन सकें। इसलिए किसी न किसी बहाने राजनेताओं की कोशिश रहती है कि वे अपने समर्थकों और मतदाताओं से आमने-सामने संवाद कर सकें। इससे उन्हें अपनी स्थिति का अंदाजा भी लगता रहता है।

मगर कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए राजनेताओं की जनता को प्रत्यक्ष संबोधित करने की कोशिश भयावह समस्या खड़ी कर सकती है। इस तरह मतदाताओं को बीमारी की गोद में डाल कर वे अपना चुनावी समीकरण ठीक भी कर लें, तो आखिर अपनी नैतिक जवाबदेही से कैसे बच सकेंगे। मगर राजनीति और चुनाव की जोर आजमाइश में भला कितने ऐसे राजनेता और दल बचे हैं, जो नैतिक जवाबदेही का मोल समझते हैं।

उन्हें तो यह भी अच्छी तरह पता है कि चुनाव के समय चाहे जितनी मनमानियां कर लो, निर्वाचन आयोग कोई गंभीर दंड नहीं दे सकता। शायद ही कोई चुनाव ऐसा हो, जिसमें राजनीतिक दलों के बड़े से बड़े नेता मर्यादाओं का उल्लंघन करते न देखे गए हों। फिर राजनीतिक दलों के समर्थकों को कौन काबू करेगा। जिस तरह वे चौदह जनवरी को जुटे, वे फिर नहीं जुटेंगे, इसे कौन रोकेगा। हालांकि इसकी जिम्मेदारी राजनीतिक दलों और उनके नेताओं की है, पर लगता नहीं कि वे अपनी इस जिम्मेदारी को समझेंगे।

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