इसमें कोई दोराय नहीं कि विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडिया’ के सामने फिलहाल बहुस्तरीय चुनौतियां खड़ी हैं और संगठित होकर इनका सामना करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। मगर पिछले कुछ समय से ‘इंडिया’ के कुछ घटकों ने गठबंधन के दायित्वों से जुड़े जैसे सवाल उठाए हैं, उन पर विचार करके आगे की दिशा तय करने की चुनौती शायद सबके लिए अहम है।

गौरतलब है कि कुछ राज्यों में विधानसभा चुनावों और उसके बाद नीट-यूजी 2026 के प्रश्नपत्र लीक होने सहित कई व्यापक महत्त्व के मुद्दों पर जनता के भीतर असंतोष के स्वर तीखे होने के बीच सोमवार को ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक हुई। माना जा रहा था कि कुछ दलों की नाराजगी का असर बैठक पर पड़ सकता है, लेकिन इसमें शामिल होने वाले दलों के बीच कई मुद्दों पर साझा अभियान चलाने पर सहमति बनी।

मुख्य रूप से एसआइआर और चुनावों में वोटों की गड़बड़ी पर सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखने के अलावा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर सभी दल सहमत थे। नाजुक आर्थिक स्थिति, बेरोजगारी, महंगाई और समाज के कमजोर तबकों के मुद्दों पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने की भी मांग की गई।

हालांकि तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद कांग्रेस ने जिस तरह सत्ता में आई टीवीके के साथ नया मोर्चा बना लिया, उसके बाद द्रमुक का ‘इंडिया’ में साथ रहना वैसे भी मुश्किल था। इसी तरह, माकपा ने भी केरल में चुनाव के दौरान कांग्रेस के रुख पर सवाल उठाया।

मतभेद के मुद्दों पर संवाद और एक-दूसरे को समान स्तर पर अहमियत देना गठबंधन को मजबूत करने का एक रास्ता हो सकता है, लेकिन यह तभी संभव है जब इसके सभी सदस्य-दलों के भीतर सामूहिक भावना के साथ राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने की इच्छाशक्ति हो।

जिस समय राजनीतिक चुनौतियां गहरा रही हों, वैसे में साझा मोर्चा मजबूत करने का रास्ता निकालने के लिए न्यूनतम बिंदुओं पर सहमति के रास्ते तैयार करने की जरूरत है। लोकतंत्र एक मजबूत विपक्ष के मुखर स्वर से ही जीवित रहता है। ऐसे में कुछ मतभेदों के बावजूद ‘इंडिया’ गठबंधन में शामिल दलों के बीच नए सिरे से मैदान में उतरने और हर दो महीने में बैठक करने पर बनी सहमति शायद वक्त का तकाजा भी है।