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जनतंत्र का तकाजा

राजस्थान में पूर्ण शराबबंदी और सक्षम लोकायुक्त, जिसकी परिधि में सरकार के सभी स्तर के कर्मचारी और चुने गए सरपंच से लेकर मुख्यमंत्री तक शामिल हों ...

Author November 7, 2015 10:03 AM

राजस्थान में पूर्ण शराबबंदी और सक्षम लोकायुक्त, जिसकी परिधि में सरकार के सभी स्तर के कर्मचारी और चुने गए सरपंच से लेकर मुख्यमंत्री तक शामिल हों और जिसके पास प्रशासनिक और न्यायिक शक्तियां हों- की मांग को लेकर पूर्व विधायक और गांधीवादी गुरुशरण छाबड़ाजी बत्तीस दिन से जारी अनशन और सरकार की अनदेखी के बीच शहीद हो गए। वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली राज्य सरकार संविधान में प्रदत्त ‘जीने के अधिकार’ को भूल रही है। उसने अनशनरत छाबड़ाजी के जीवन को बचाने का न तो कोई गंभीर प्रयास किया और न ही उनके उठाए मुद्दों का कोई संज्ञान लिया।

शराब जो आदमी, उसके परिवार और समाज को तबाह कर रही है और घरेलू हिंसा और महिला उत्पीड़न का एक बड़ा कारण बन कर समाज को निरंतर शर्मसार करते हुए हमारी आधी आबादी महिलाओं के जीवन को नरक बना रही है- के व्यापार को राजस्व प्राप्ति के लोभ में जारी रखने की सरकार की कुनीति आम नागरिक और समाज के लिए विनाशक सिद्ध हो रही है। जिस तरह शराब मानव शरीर को खोखला कर रही है, उसी तरह भ्रष्टाचार जनता तक पहुंचने वाली वांछित राशि और सरकारी राजस्व में आने वाले स्रोतों के प्रवाह को अवरुद्ध कर जनता और शासन दोनों को क्षति पहुंचाते हुए व्यक्ति विशेष की झोली भर रहा है, पर कारगर अंकुश लगाने के लिए सशक्त लोकायुक्त की निहायत जरूरत की सरकार निरंतर अनदेखी कर रही है।

राजस्थान में प्राकृतिक संपदाओं की बंदरबांट के कारनामे निरंतर हमारे सामने उजागर हो रहे हैं। निजीकरण और पीपीपी के नाम पर कुछ खास लोगों को सरकारी संपदाओं के हस्तांतरण जैसे नित नए कारनामे भ्रष्टाचार को नए रूप में जन्म दे रहे हैं। ऐसे में एक सक्षम लोकायुक्त का गठन होना, प्रदेश के लिए निहायत जरूरी है, जिसकी परिधि में मुख्यमंत्री तक शामिल हों। शराबबंदी और सक्षम लोकायुक्त की मांग को लेकर अनशनरत गुरुशरण छाबड़ाजी का निधन सरकार की जिम्मेदारी से परे उसे विफल साबित करता है।

बत्तीस दिन के निरंतर अनशन के दौरान सरकार का कोई प्रतिनिधि उनसे मिलने तक नहीं आया। इतना ही नहीं, पिछले साल इन्हीं मुद्दों को लेकर जब छाबड़ाजी अनशन पर बैठे थे। तब राज्य सरकार से पंद्रह मई, 2014 को करीब डेढ़ दर्जन बिंदुओं पर समझौता हुआ था। उसे लागू न होता देख छाबड़ाजी ने दो अक्तूबर 2015 से अनशन पर बैठने का कार्यक्रम तय किया था। सरकार ने न तो उनके अनशन पर बैठने से पहले और न ही अनशन पर बैठे रहने के दौरान इस पर कोई चर्चा की और पूर्व में हुए समझौते के क्रियान्वयन की सोची। इतना ही नहीं, उनकी शहादत के बाद उनके उठाए किसी मुद्दे पर विचार करना तक गंवारा नहीं किया।

ऐसी सरकार, जिसका न जनता से कोई सरोकार है और न ही उसे उनके मुद्दों और संविधान प्रदत्त जीने के अधिकार की रक्षा की कोई चिंता है। तब ऐसी सरकार को जनता और उसका संघर्ष ही रास्ते पर ला सकता है। लेकिन क्या छाबड़ा जैसे लोग यों ही बलि चढ़ते रहेंगे और सरकारें बहुमत पाकर तानाशाही करती रहेंगी? वसुंधरा राजे सरकार को चाहिए कि छाबड़ाजी के बताए रास्ते पर चल कर, शराब पर पूर्ण रूप से रोक लगाए।
’रामचंद्र शर्मा, तरुछाया नगर, जयपुर

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