राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के विवेक विहार इलाके में एक रिहाइशी इमारत में आग से नौ लोगों की मौत की घटना को लेकर जो बातें सामने आई हैं, उनसे सुरक्षा प्रबंधों पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। इमारत में सेंधमारी से बचाव के लिए लगाई गई ‘सेंट्रल लॉक’ प्रणाली, लोहे की मोटी ग्रिल और निकास के लिए वैकल्पिक बंदोबस्त न होना जानलेवा साबित हुआ। सुरक्षा के नाम पर की गई इस व्यवस्था ने आग और धुएं से घिरे लोगों के बचाव के रास्ते को ही बंद कर दिया।

सवाल है कि बड़े शहरों में बनने वाले आवासीय परिसरों में सुरक्षा इंतजामों की समय-समय पर जांच क्यों नहीं की जाती? जब किसी इमारत में एक खतरे के मद्देनजर कोई सुरक्षात्मक प्रबंध किए जाते हैं, तो दूसरे जोखिमों को नजरअंदाज क्यों कर दिया जाता है! क्या भवन निर्माताओं के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन की यह जिम्मेदारी नहीं है कि नागरिकों की सुरक्षा के लिए आवासीय परिसरों में सभी जरूरी व्यवस्थाएं की जाएं?

गौरतलब है कि रविवार तड़के हुई आग की इस घटना के दौरान इमारत की बिजली आपूर्ति बंद हो जाने से ‘सेंट्रल लॉक’ प्रणाली ने भी काम करना बंद कर दिया और दरवाजा नहीं खुलने से लोग अंदर ही फंसे रह गए। जब बचाव कार्य शुरू हुआ, तो बंद बालकनी और इमारत में पीछे की ओर लगी लोहे की मोटी ग्रिल की वजह से लोगों को तत्काल बाहर नहीं निकाला जा सका। बाद में ग्रिल को काटकर रास्ता बनाया गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।

यही नहीं, इमारत में आने-जाने के लिए केवल एक ही सीढ़ी थी, आपात स्थिति में निकासी के लिए वैकल्पिक मार्ग की कोई व्यवस्था नहीं थी। हैरत की बात है कि वाहनों और इमारतों में आग की घटना के दौरान ‘सेंट्रल लॉक’ प्रणाली की वजह से जान जाने की खबरें अक्सर आती रहती हैं, इसके बावजूद सुरक्षा के स्तर पर कहीं कोई गंभीरता नजर नहीं आती है। आवासीय इमारतों में सुरक्षा उपायों की गहन जांच-पड़ताल के बिना ही बिजली-पानी के कनेक्शन दे दिए जाते हैं। सरकार और स्थानीय प्रशासन को चाहिए कि इस तरह की अनियमितता और लापरवाही बरतने वालों की जवाबदेही तय की जाए, ताकि नागरिकों की सुरक्षा से खिलवाड़ न हो।