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संपादकीय: कानून के हाथ

दिल्ली में हुई व्यापक हिंसा में जानमाल का भारी नुकसान हुआ और दर्जनों निर्दोष लोगों की जान चली गई। अब भी जिस तरह की खबरें, तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे हैं, उनसे हिंसा का दायरा और भयावहता का अंदाजा होता है। जिनके घर जला दिए गए, सब कुछ बर्बाद कर दिया गया, परिवार के सदस्यों की हत्या कर दी गई, उनका दुख और उन्हें संभल कर फिर खड़ा होने में किस तरह चुनौतियां हैं, यह भी सहज समझा जा सकता है।

Author Published on: March 7, 2020 12:17 AM
Delhi violence,दिल्ली हिंसा में अबतक 53 लोगों की मौत हो चुकी है। (प्रतीकात्मक फोटो)

हाल ही में राजधानी दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाके में जिस तरह हिंसा की व्यापक घटनाएं सामने आईं, वह किसी भी संवेदनशील इंसान को दहला देने के लिए काफी हैं। फिलहाल हिंसा थम गई है, लेकिन अब तक इसमें तिरपन लोगों की मौत की खबरें आ चुकी हैं। सवाल है कि इतनी बड़ी घटना और इस पर काबू नहीं पा सकने के लिए किसकी जिम्मेदारी तय की जाएगी! तीन-चार दिनों तक चली हिंसा और आगजनी की घटनाओं के बीच मारे गए तमाम लोगों की खबरों के बीच खुफिया विभाग के एक कर्मचारी की मौत ने सबका ध्यान खींचा था।

जहां यह घटना हुई थी, वहां के हालात को देखते हुए इस बात की आशंका जताई गई कि वहां हुई हिंसा और इस हत्या में आम आदमी पार्टी के स्थानीय पार्षद ताहिर हुसैन का हाथ है। हालांकि वे शुरू से ही इन आरोपों से इनकार करते रहे और खुद को हिंसा से पीड़ित बताया। लेकिन घटना के संबंध में जिस तरह के ब्योरे और वीडियो सार्वजनिक हुए थे, उससे उन पर लगे आरोपों को बल मिला और पुलिस उनकी गिरफ्तारी की कोशिश में थी। गुरुवार को दिल्ली की एक अदालत में आत्मसमर्पण के क्रम में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया।

जाहिर है, उन पर लगे आरोपों की जांच और अदालती सुनवाई की प्रक्रिया के बाद ही कोई निष्कर्ष सामने आ सकेगा, लेकिन इससे इतना साफ है कि जिस वक्त हिंसा पर काबू पाने और लोगों को संभालने की सबसे ज्यादा जरूरत थी, उस वक्त कुछ लोग हिंसा को भड़काने में लगे हुए थे। क्या यह अपने आप में गहरा सवाल नहीं है कि जिस जगह पर आइबी कर्मी की हत्या हुई, वहीं आसपास पार्षद ताहिर हुसैन का घर है और राजनीतिक स्तर पर उनका जो कद है, उसमें वे पुलिस की सहायता लेने से लेकर खुद अपने स्तर पर लोगों को शांत करने की कोशिश कर सकते थे? अब भी इस मसले पर उन्होंने यही सफाई पेश की है कि तनाव और हिंसा के बीच वे फंसे हुए थे और उनके घर से खुद पुलिस ने उन्हें बचा कर निकाला। लेकिन अगर उनकी इस बात में सच्चाई है तो उन्हें घटना के बाद गायब या फरार होने की जरूरत क्यों पड़ी? अगर वे खुद को निर्दोष मानते हैं और भारतीय न्याय व्यवस्था पर उन्हें भरोसा है तो अपने आप को पुलिस को हवाले करने में वे हिचक क्यों रहे थे?

दिल्ली में हुई व्यापक हिंसा में जानमाल का भारी नुकसान हुआ और दर्जनों निर्दोष लोगों की जान चली गई। अब भी जिस तरह की खबरें, तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे हैं, उनसे हिंसा का दायरा और भयावहता का अंदाजा होता है। जिनके घर जला दिए गए, सब कुछ बर्बाद कर दिया गया, परिवार के सदस्यों की हत्या कर दी गई, उनका दुख और उन्हें संभल कर फिर खड़ा होने में किस तरह चुनौतियां हैं, यह भी सहज समझा जा सकता है। ऐसे आरोप भी सामने आए हैं कि यह हिंसा सुनियोजित थी और बेलगाम दंगाइयों को ज्यादा लोगों को मार डालने से लेकर संपत्तियों का नुकसान करने का मौका इसलिए मिला कि पुलिस ने अपेक्षित स्तर पर सक्रियता नहीं दिखाई।

यह सवाल भी बना रहेगा कि तीन-चार दिनों तक चलने वाली इस हिंसा को भड़काने वालों के खिलाफ समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई! भले ही पुलिस ने इस हिंसा से संबंधित सैकड़ों प्राथमिकियां दर्ज की हैं और कई सौ लोगों को गिरफ्तार किया है, लेकिन यह देखने की बात होगी कि वास्तव में कितने दोषियों पर आरोप सिद्ध हो पाते हैं और उन्हें सजा मिल पाती है!

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