राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और इसके आस-पास के क्षेत्र में खुले नाले एवं पानी से भरे गड्ढे जानलेवा साबित हो रहे हैं। हाल के दिनों में एक के बाद एक हादसों के बावजूद शासन-प्रशासन के स्तर पर एहतियाती उपायों को लेकर कोई गंभीर प्रयास होते नजर नहीं आ रहे हैं। इसी लापरवाही के कारण दिल्ली के मुकुंदपुर इलाके में पिछले दिनों खुले नाले में गिरने से एक मासूम बच्ची की जान चली गई।
इस मामले में सरकार की ओर से सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग में अनुबंध पर कार्यरत एक कनिष्ठ अभियंता को नौकरी से निकाल दिया गया। मगर सवाल है कि क्या निचले स्तर के कर्मियों पर इस तरह की कार्रवाई से व्यवस्था में सुधार हो पाएगा? इसमें दोराय नहीं कि नागरिकों की सुरक्षा और खासकर बच्चों को सुरक्षित वातावरण प्रदान करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। मगर कर्तव्य में लापरवाही बरते जाने के मामलों में क्या संबंधित अधिकारियों की भी जवाबदेही तय नहीं की जानी चाहिए! जब उच्चाधिकारी ही जन समस्याओं के समाधान पर ध्यान नहीं देंगे, तो निचले कर्मियों से क्या उम्मीद की जा सकती है।
यह अक्सर देखने में आता है कि इस तरह के मामलों में या तो जिम्मेदारी ठेकेदारों पर डाल दी जाती है या फिर कार्रवाई के नाम पर निचले कर्मचारियों को निलंबित कर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। मुकुंदपुर की घटना में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। सवाल है कि इस क्षेत्र में खुले नाले को ऊपर से ढकने की जिम्मेदारी क्या सिर्फ अनुबंध पर कार्यरत कनिष्ठ अभियंता की ही थी, उच्च अधिकारियों का इससे कोई सरोकार नहीं था? सड़क पर खुदाई के बाद पानी से भरे गड्ढों और नालों को खुला छोड़ देने का जोखिम विभागीय अधिकारियों को नजर क्यों नहीं आता?
दिल्ली सरकार का कहना है कि इस तरह की घटनाओं में लापरवाही बरतने पर अब जवाबदेही तय होगी, लेकिन इस बात पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि जब तक संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक व्यवस्था में सुधार की उम्मीद धुंधली ही रहेगी। सरकार को चाहिए कि जलभराव वाली जगहों और खुले नालों की पहचान कर उन्हें तुरंत दुरुस्त किया जाए, ताकि लोगों की जान को किसी तरह का खतरा न हो।
