Jansatta Editorial News: इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जो काम सरकार को खुद करना चाहिए, उसके बारे में या तो अदालतें याद दिलाती हैं या फिर आम जनता को सड़क पर उतर कर आंदोलन करना पड़ता है। यह किसी भी सरकार के लिए शर्मिंदगी का मामला होना चाहिए कि आए दिन ‘सब ठीक है’ के सरकारी दावे के बरक्स ऐसी घटनाएं हो रही होती हैं, जो कानून-व्यवस्था की लाचारगी को ही दिखाती हैं।

दिल्ली में चौकसी के तमाम दावों के बावजूद महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा मे कमी नहीं आ रही है, तो यह प्रशासनिक तंत्र की नाकामी ही है। शायद यही वजह है कि दिल्ली सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सामूहिक बलात्कार की कई घटनाओं के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और प्रशासनिक तंत्र को कठघरे में खड़ा किया है।

दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को हाल के दिनों में दिल्ली में सामने आए बलात्कार के कई मामलों का स्वत: संज्ञान लिया। इनमें एक पार्क में सामूहिक बलात्कार और चलती बस के अंदर नाबालिग के खिलाफ यौन हिंसा की घटना भी शामिल हैं। अदालत ने साफतौर पर दर्ज किया है कि दिल्ली-एनसीआर में यौन हिंसा की घटनाएं कानून लागू करने वाली एजंसियों की ओर से बुनियादी सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक व्यवस्थित विफलता को रेखांकित करती हैं।

कहीं भी जब जघन्य अपराधों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जाती है, तो इसका मतलब यही होता है कि वहां शासन-प्रशासन हालात को संभालने में नाकाम है और इसका खमियाजा आखिरकार साधारण जनता को उठाना पड़ता है। दिल्ली में जब वर्ष 2012 में चलती बस में निर्भया के बलात्कार और उसकी बर्बर हत्या का मामला सामने आया था, तब समूचे देश में आक्रोश फैल गया था।

व्यापक आंदोलन के बाद जस्टिस जेएस वर्मा समिति ने महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा पर विस्तृत सिफारिशें दी थीं। तब समाज में दिखी जागरूकता और सरकार की सक्रियता से यह उम्मीद बंधी थी कि कम से कम आने वाले वक्त में महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल सुनिश्चित कराया जा सकेगा। हकीकत यह है कि उस त्रासद घटना के बाद भी न तो महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा में कमी आई, न ही सरकार या पुलिस की कार्यशैली में कोई खास बदलाव दिखा।

ऐसी हर वारदात के बाद अपराधियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई जैसी सरकारी औपचारिक घोषणाएं होती रहीं, लेकिन आज भी हालत यह है कि आए दिन दिल्ली-एनसीआर में सामूहिक बलात्कार जैसी जघन्य वारदात की खबरें अक्सर आती रहती हैं।

इस संबंध में शीर्ष अदालत ने ठीक कहा है कि सामूहिक बलात्कार के मामलों में जवाबदेही तय करना जरूरी है। आमतौर पर होता यही है कि किसी महिला के खिलाफ यौन हिंसा होती है, तो मामले के तूल पकड़ने के बाद सरकार उस पर ठोस कार्रवाई का आश्वासन देती है, वरना वह कोई रोजमर्रा की आपराधिक घटना की तरह गुजर जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने जिन घटनाओं को ध्यान में रखते हुए स्वत: संज्ञान लिया है, वह अपनी प्रकृति में निर्भया के साथ हुई घटना की तरह ही है। कुछ घटनाओं में पीड़िता की जान किसी तरह बच गई, लेकिन कई मामलों में लड़की की हत्या कर दी गई।

देश की राजधानी होने के नाते उम्मीद की जाती है कि यहां की बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की वजह से अपराधियों का रास्ता आसान नहीं होगा। मगर हकीकत यह है कि हत्या और बलात्कार की ज्यादातर घटनाओं में आपराधिक मानसिकता वालों के भीतर पुलिस का कोई खौफ नहीं दिखता। ऐसे माहौल में महिलाएं कैसे खुद को सुरक्षित महसूस करें?

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एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव केवल सरकार चुनने का माध्यम नहीं, बल्कि शासन की दिशा तय करने और राष्ट्र निर्माण में आम नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने का अवसर भी होता है। इसलिए चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए बेहद जरूरी है। पढ़िए पूरी खबर…