Jansatta Editorial: दिल्ली के जनकपुरी इलाके में खुले गड्ढे में गिर कर एक मोटरसाइकिल सवार की मौत की घटना ने फिर यही साबित किया है कि सरकार के संबंधित महकमे किस कदर संवेदनहीन और गैरजिम्मेदार हैं। इस बात की कोई फिक्र नहीं दिखती कि अधिकारियों की लापरवाही से किसी की जान तक चली जा रही है।
गौरतलब है कि जनकपुरी इलाके में डिस्ट्रिक सेंटर के नजदीक सीवर पाइपलाइन परियोजना के लिए करीब पंद्रह फुट गहरा गड्ढा खोदा गया था, जो खुला था। गुरुवार रात काम के बाद घर लौटते हुए एक पच्चीस वर्षीय युवक उसी गड्ढे में गिर गया और उसकी मौत हो गई। उसके परिजन रात भर उसे खोजते रहे, लेकिन उन्हें सुबह घटना की जानकारी मिली।
यह भी पढ़ें: ‘क्या अपने बच्चे का फोन छीनना पाप है’, गाजियाबाद में आत्महत्या करने वाली तीनों लड़कियों के पिता का बयान
खबरों के मुताबिक, घटना की जानकारी एक उप-ठेकेदार को रात में मिल गई थी, मगर उसने न तो पुलिस को बताना जरूरी समझा, न ही समय पर आपातकालीन सेवा को सूचित किया। घटना के तूल पकड़ लेने के बाद दिल्ली जल बोर्ड के तीन इंजीनियरों को निलंबित करने और उप-ठेकेदार को गिरफ्तार करने के अलावा गैरइरादतन हत्या की धारा के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।
मगर अधिकारियों की जिस जानलेवा लापरवाही की वजह से एक व्यक्ति की जान चली गई, वह कब तक एक रिवायत की तरह बनी रहेगी। सड़कों के किनारे खुले गड्ढे या मैनहोल में किसी के गिर जाने से बुरी तरह घायल होने या फिर मौत की यह कोई पहली घटना नहीं है। विचित्र यह है कि जो मामले सुर्खियों में आ जाते हैं, उन पर सरकार कार्रवाई करती दिखती है, मगर थोड़े ही दिनों बाद फिर हर तरफ लापरवाही का आलम छाया दिखता है।
यह भी पढ़ें: अगले महीने रिटायर होने वाले थे पुलिस इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद, सूरजकुंड मेले में लोगों को बचाने की कोशिश में गंवाई जान
सीवर के लिए पाइप लाइन या फिर किसी अन्य कार्य की वजह से बड़े-बड़े गड्ढे खोद तो दिए जाते हैं, लेकिन वहां कोई भी सुरक्षा घेरा और खतरे का संकेतक लगाने की जरूरत नहीं समझी जाती। सिर्फ इसी लापरवाही की वजह से अक्सर सड़क किनारे खुले नाले, गड्ढे या मैनहोल में गिर कर किसी की मौत हो जाती है।
सवाल है कि इस तरह की बदस्तूर लापरवाहियों की वजह से होने वाली मौत को हत्या की श्रेणी में क्यों नहीं माना जा सकता। अफसोसनाक यह है कि ऐसी घटनाओं के बावजूद संबंधित महकमे और उनके अधिकारी कोई सबक लेने को तैयार नहीं दिखते। ‘ऑरेंज अर्थव्यवस्था’ बदलेगी भारत की आर्थिक तकदीर, बजट 2026 से हैं उम्मीदें
