ताज़ा खबर
 

संपादकीय: कठघरे में पुलिस

जामिया मिल्लिया परिसर में पुलिस के घुसने को लेकर सबसे पहला सवाल तो यही उठा था कि वह किसकी इजाजत से परिसर में घुसी थी। वहां की कुलपति ने भी यह गंभीर सवाल उठाया था।

जामिया मामले में दिल्ली पुलिस के रवैए पर हाईकोर्ट ने सख्त ऐतराज जताया है। कहा कि पुलिस का रवैया प्रोफेसनल नहीं था।

दिल्ली पुलिस की कार्यशैली को लेकर काफी समय से अंगुलियां उठती रही हैं। पर जामिया मिल्लिया इस्लामिया की घटना के बाद उसकी निष्ठा पर भी सवाल उठने लगे। अब दिल्ली उच्च न्यायालय ने कह दिया है कि जामिया मिल्लिया मामले में पुलिस का तरीका पेशेवराना नहीं था। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में चल रहे आंदोलन के दौरान एक रात दिल्ली पुलिस ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया परिसर में घुस कर विद्यार्थियों की बर्बरता पूर्वक पिटाई की थी।

उसमें लाइब्रेरी में अध्ययन कर रहे विद्यार्थियों, छात्रावास में रह रही लड़कियों तक पर लाठियां बरसाई गई थीं। उस घटना की अनेक तस्वीरें सोशल मीडिया पर प्रसारित हुईं, मीडिया में भी आईं। स्वाभाविक ही पुलिस के इस रवैए से जामिया के विद्यार्थियों के साथ पूरे देश में आक्रोश उभरा था और उस कार्रवाई को लेकर तरह-तरह के सवाल उठने शुरू हो गए थे।

इस घटना की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित करने की मांग उठी। अदालत में इसकी गुहार लगाई गई। उस घटना पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लिया था। उसकी रिपोर्ट के आधार पर ही उच्च न्यायालय ने ताजा टिप्पणी की है।

जामिया मिल्लिया परिसर में पुलिस के घुसने को लेकर सबसे पहला सवाल तो यही उठा था कि वह किसकी इजाजत से परिसर में घुसी थी। वहां की कुलपति ने भी यह गंभीर सवाल उठाया था। पुलिस ने न सिर्फ छात्र-छात्राओं से मारपीट की, बल्कि विश्वविद्यालय की संपत्ति को भी काफी नुकसान पहुंचाया था। विश्वविद्यालय परिसर स्वायत्तशासी होते हैं और उनमें वहां के प्रशासन की अनुमति के बगैर पुलिस का प्रवेश वर्जित होता है। यह दुनिया भर का नियम है। दिल्ली पुलिस इससे अनजान नहीं मानी जा सकती।

जामिया मामले में पुलिस ने विश्वविद्यालय प्रशासन से इजाजत नहीं ली थी। जब यह सवाल उठा तो उसकी दलील थी कि वहां कानून-व्यवस्था का मामला गंभीर हो गया था, इसलिए उसे प्रवेश की इजाजत लेने का समय नहीं था। मानवाधिकार आयोग ने भी कहा है कि वहां कानून-व्यवस्था का मामला था, जिसे अतिरिक्त महान्यायवादी ने अदालत के सामने उद्धृत करते हुए पुलिस के परिसर में प्रवेश को उचित ठहराने का प्रयास किया। पर अदालत ने इस आधार पर पुलिस को निर्दोष मानने से इनकार कर दिया। सवाल सिर्फ परिसर में घुसने का नहीं, उसके पूरे रवैए का है। यह सवाल अब भी बना हुआ है कि आखिर पुलिस का असल मकसद क्या था।

यह ठीक है कि नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देश भर में आंदोलन उठ खड़े हुए थे और जामिया में कुछ अधिक ही तीखा विरोध हो रहा था, पर उससे निपटने का यह तरीका कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता कि पुलिस रात के अंधेरे में विद्यार्थियों पर बर्बरतापूर्वक हमला कर दे। उस घटना में कई विद्यार्थी गंभीर रूप से घायल हुए थे। दंगों के वक्त भी, जब भीड़ उग्र होती है, पुलिस से अपेक्षा की जाती है कि वह किसी प्रकार के जान-माल का नुकसान न पहुंचाते हुए उस पर काबू पाए।

इसके लिए पुलिस को बकायदा प्रशिक्षण दिया जाता है। जामिया में तो ऐसी कोई स्थिति नहीं थी कि पुलिस को अपने बचाव में बर्बरतापूर्वक लाठी चलानी पड़े। उसमें छात्राओं तक का लिहाज न किया जाए। आखिर उसने ऐसी रणनीति क्यों बनाई। जामिया की घटना ने दिल्ली पुलिस को अनेक सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 संपादकीय: नापाक चेहरा
2 संपादकीय: स्वच्छता की मिसाल
3 संपादकीय: अभाव का पाठ
यह पढ़ा क्या?
X