संपादकीय: बिजली के वाहन

दिल्ली में इस वक्त पेट्रोल, डीजल और सीएनजी से चलने वाले वाहनों की संख्या सवा करोड़ से ज्यादा है, जिनमें सत्तर लाख के करीब दुपहिया वाहन और पचास लाख के लगभग कारें हैं। जबकि ई-वाहनों की संख्या पचास हजार भी नहीं है। ऐसे में सरकार का लक्ष्य जितना बड़ा है, उतना ही चुनौती भरा भी। भारत में ई-वाहनों के बढ़ावा देने में अभी व्यावहारिक कठिनाइयां भी कम नहीं हैं।

दिल्ली में दो सौ से ज्यादा चार्जिंग स्टेशन बनाने के अलावा दफ्तरों के परिसरों और पार्किंग स्थलों पर भी चार्जिंग की सुविधा मिलेगी

दिल्ली सरकार ने बिजली से चलने वाले वाहनों के लिए जिस नई इलैक्ट्रिक वाहन (ई-वाहन) नीति-2020 को अधिसूचित किया है, वह देश की राजधानी को प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में निश्चित रूप से एक बड़ा कदम है। लंबे समय से यह प्रयास चल रहे हैं कि देश में बिजली से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा दिया जाए, ताकि शहरों में तेजी से बढ़ रही वायु प्रदूषण की समस्या से निपटा जा सके। इसी कवायद के तहत दिल्ली सरकार की कैबिनेट ने पिछले साल दिसंबर में ई-वाहन नीति को हरी झंडी दी थी।

नई नीति में सबसे ज्यादा जोर इसी बात पर दिया गया है कि बिजली वाहनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए लोगों को हर स्तर पर सुविधाएं दी जाएं। सरकार पहले एक-एक हजार दुपहिया वाहनों, ई-आटो रिक्शा और माल ढुलाई वाले वाहनों की खरीद पर तीस-तीस हजार रुपए का अनुदान देगी। जबकि पहले एक हजार ई-कारों के खरीदारों के लिए यह अनुदान डेढ़ लाख रुपए मिलेगा। किसी भी ई-वाहन खरीदार को पथ-कर और पंजीकरण शुल्क नहीं देना पड़ेगा। इन रियायतों के पीछे मकसद यही है कि लोग ई-वाहन खरीदने को प्रोत्सिहत हों और उन पर बोझ न पड़े।

दिल्ली में इस वक्त पेट्रोल, डीजल और सीएनजी से चलने वाले वाहनों की संख्या सवा करोड़ से ज्यादा है, जिनमें सत्तर लाख के करीब दुपहिया वाहन और पचास लाख के लगभग कारें हैं। जबकि ई-वाहनों की संख्या पचास हजार भी नहीं है। ऐसे में सरकार का लक्ष्य जितना बड़ा है, उतना ही चुनौती भरा भी। भारत में ई-वाहनों के बढ़ावा देने में अभी व्यावहारिक कठिनाइयां भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ी समस्या ई-वाहनों के सफल परिचालन के लिए चार्जिंग स्टेशन जैसी बुनियादी सुविधाओं की है। इसलिए सरकार ने घरों में चार्जिंग पाइंट लगाने तक का बंदोबस्त किया है और इसके लिए भी सरकार अनुदान देगी।

दिल्ली में दो सौ से ज्यादा चार्जिंग स्टेशन बनाने के अलावा दफ्तरों के परिसरों और पार्किंग स्थलों पर भी चार्जिंग की सुविधा मिलेगी। अगर ई-वाहन खरीदने में लोगों की जेब पर बोझ न पड़े और बैटरी चार्ज करवाने के लिए धक्के न खाने पड़ें, तो निश्चित रूप से लोग बिजली वाहनों को प्राथमिकता देंगे। अब ज्यादातर वाहन निर्माता कंपनियां बिजली के वाहन बनाने की दिशा में बढ़ चुकी हैं, लेकिन अभी सब कुछ प्रयोग के स्तर जैसा ही है। भारत में ई-वाहनों का प्रयोग अभी शुरूआती चरण में है। इसलिए इसे लेकर लोगों के मन में यह शंका हो सकती है कि सामान्य वाहनों की तरह बिजली वाहन भारत में खरे उतर भी पाएंगे या नहीं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि आने वाले वक्त में बिजली के वाहन ही शहरों और महानगरों को वायु प्रदूषण से निजात दिला सकते हैं। सबसे ज्यादा प्रदूषण डीजल वाहनों से होता है। इसीलिए कई कंपनियों ने पिछले कुछ सालों में डीजल वाहन बनाने भी कम कर दिए और बिजली से चलने वाली गाड़ियां तैयार करने की दिशा में पहल की है। सरकारी स्तर पर नीतियां बनाने से कहीं ज्यादा बड़ा और चुनौती भरा काम उन पर ठोस तरीके से अमल का है। देश में कई मामलों में इसके अनुभव कोई बहुत सुखद नहीं रहे हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार अगर इस नीति पर पूरी शिद्दत के साथ काम करती है तो निश्चित रूप से इस दिशा में बड़ी कामयाबी हासिल की जा सकती है और दूसरे राज्यों के लिए यह अनुकरणीय मिसाल बन सकती है।

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