समाज में दहेज जैसी कुप्रथा की जड़ें इतनी गहरी हैं कि शिक्षा और जागरूकता के तमाम प्रयास इसके आगे बौने साबित हो रहे हैं। इससे न केवल महिलाओं को शारीरिक एवं मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ता है, बल्कि कई बार उन्हें अपनी जान तक गंवानी पड़ती है। हाल में दिल्ली के नबी करीम इलाके में एक नवविवाहिता की दहेज के लिए की गई हत्या की घटना ने एक बार फिर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

खबरों के मुताबिक, ससुराल वालों ने शादी के बाद से इस महिला को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था। अभी शादी को एक सप्ताह भी नहीं हुआ था कि उसकी हत्या कर शव को पलंग के बॉक्स में छिपा दिया गया। पुलिस घटना के बाद से फरार आरोपी पति को तलाशने में जुटी है। सवाल है कि दहेज के खिलाफ सख्त कानून होने के बावजूद इस तरह की घटनाओं पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? क्या दहेज के लोभियों पर शिकंजा कसने में सुरक्षा एजेंसियों के स्तर पर लापरवाही बरती जा रही है?

यह अफसोसनाक है कि समाज में अल्पशिक्षित या अनपढ़ महिलाएं ही नहीं, बल्कि शिक्षित और कामकाजी स्त्रियों को भी दहेज उत्पीड़न का दंश झेलना पड़ता है। विचित्र बात है कि शादी में स्वेच्छा से दिए जाने वाले उपहार को कुछ लोग आज भी अपना हक मानते हैं। शादी से पहले या बाद में दुल्हन पक्ष पर दहेज के लिए दबाव बनाया जाता है। महंगे उपहार न देने पर विवाहिता के साथ दुर्व्यवहार और मारपीट आम बात हो गई है। नबी करीम इलाके की घटना ने इस सामाजिक कुरीति के विद्रूप चेहरे को एक बार फिर सामने लाया है।

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि कई महिलाएं तो भय और सम्मान की खातिर पुलिस में शिकायत तक दर्ज नहीं करा पाती हैं। महिलाओं में अपने अधिकारों को लेकर जानकारी का अभाव भी इसका एक बड़ा कारण है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि महिलाओं में जागरूकता लाने के लिए व्यापक स्तर पर कदम उठाए जाएं। साथ ही महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों को भी संवेदनशील बनाना होगा और उनकी जवाबदेही तय करनी होगी।