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गहराता संकट

यूक्रेन के मुद्दे पर अमेरिका और रूस के बीच जिस तरह की तनातनी मची है, उसे कोई अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता।

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सांकेतिक फोटो।

यूक्रेन के मुद्दे पर अमेरिका और रूस के बीच जिस तरह की तनातनी मची है, उसे कोई अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता। पिछले कुछ दिनों से दोनों देश एक दूसरे को धमका रहे हैं। इससे तो लग रहा है कि न जाने कौन कब हमला कर बैठे और मिसाइलों और बमों की बारिश होने लगे। हालात दिनोंदिन कितने गंभीर होते जा रहे हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दुनिया के तमाम देशों के नेता और राजनयिक युद्ध के खतरे को टालने में जुटे हैं। वार्ताओं के दौर चल रहे हैं। पर शांति के आसार नजर आ नहीं रहे, बल्कि आशंकाएं गहराती जा रही हैं।

रूस के करीब डेढ़ लाख सैनिक यूक्रेन की सीमा से सटे बेलारूस तक पहुंच चुके हैं। दूसरी ओर कनाडा और ब्रिटेन जैसे देश भी यूक्रेन को हथियार और जंग के दूसरे सामान दे रहे हैं। और सबसे बड़ी बात तो यह कि अमेरिका ने यूक्रेन के लिए बीस करोड़ डालर की सुरक्षा सहायता का एलान तक कर डाला। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की यह धमकी कि रूस को यूक्रेन में घुसपैठ की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, बता रही है कि अमेरिका अब यूक्रेन को जंग का नया अखाड़ा बनाने की दिशा में बढ़ चुका है।

यूक्रेन को लेकर महाशक्तियों की यह रस्साकशी कोई नई नहीं है। सोवियत संघ के विघटन के बाद अलग देश बने यूक्रेन को रूस किसी भी कीमत पर अपने हाथ से निकलने नहीं देना चाहता। इसीलिए वह यूक्रेन को नाटो में शामिल नहीं होने देना चाहता। नाटो में यूक्रेन के शामिल होने का मतलब होगा उसका पश्चिम के प्रभाव में चले जाना और फिर वहां पश्चिमी ताकतों खासतौर से अमेरिका का दबदबा बढ़ना।

इससे रूस की सुरक्षा के लिए खतरा बढ़ेगा। यूक्रेन रूस के लिए सामरिक लिहाज से भी खासा महत्त्व रखता है। क्रीमिया पर रूस कब्जा कर ही चुका है। यह भी गौर किया जाना चाहिए कि इस संकट की मूल वजह भी क्रीमिया में ही छिपी है। तत्कालीन सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने 1954 में यूक्रेन को एक तोहफे के रूप में क्रीमिया सौंपा था। लेकिन सोवियत संघ टूटने के बाद रूस ने क्रीमिया को यूक्रेन से वापस लेने की कोशिशें शुरू कर दीं और यह संकट गहराता गया। इसलिए रूस और यूक्रेन के बीच अक्सर टकराव होते रहे हैं।

अब ज्यादा बड़ा खतरा तो इस बात का खड़ा हो गया है कि कहीं यूक्रेन, अमेरिका और रूस के शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा न बन जाए। अफगानिस्तान का उदाहरण सामने है। रूस और अमेरिका की प्रतिस्पर्धा ने इस देश को तबाह कर डाला। सीरिया में भी दोनों देश इसी तरह से अपनी ताकत दिखाते रहे हैं और इसका नतीजा लाखों बेगुनाहों की मौत और पलायन के रूप में दुनिया ने देखा है। सामरिक महत्त्व वाले छोटे-छोटे देशों को निशाना बना कर महाशक्तियां जिस तरह से अपने हित साध रही हैं, वह खतरा किसी एक देश या महाद्वीप के लिए नहीं बल्कि पूरी मानव जाति के लिए है।

चाहे अफगानिस्तान का मुद्दा हो या यूक्रेन का या फिर ऐसा ही कोई अन्य विवाद हो, पूरी दुनिया दो खेमों में बंट चुकी है। पश्चिमी देश अमेरिका के नेतृत्व में चल रहे हैं, तो रूस को चीन का पूरा समर्थन है। अगर यूक्रेन नाटो का हिस्सा बन जाता है और फिर ऐसे में रूस यूक्रेन पर हमला करता है तो अमेरिका शांत नहीं बैठने वाला। तब यह तीसरे विश्वयुद्ध की घंटी बजाने जैसा ही होगा।

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