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संपादकीय: हिरासत में मौत

राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के एक आंकड़े के मुताबिक सन 2017 में पुलिस हिरासत में सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। इनमें से अट्ठावन लोग रिमांड पर नहीं थे, यानी उन्हें गिरफ्तार तो किया गया, लेकिन अदालत में पेश नहीं किया गया। क्या यह कहना सही नहीं होगा कि वे अट्ठावन लोग अपने ऊपर लगे आरोपों के साबित हुए बिना ही मर गए और हो सकता है उनमें से कई निर्दोष रहे हों?

uttar pradesh, lucknow, dalit youth deadइस मामले में पुलिस स्टेशन के इंचार्ज को सस्पेंड कर दिया गया है। प्रतीकात्मक तस्वीर।

उत्तर प्रदेश के रायबरेली में पुलिस की बर्बर पिटाई से एक युवक की मौत की खबर ने ऐसे आरोपों को ही आधार प्रदान किया है कि हिरासत में कमजोर तबकों के लोगों के साथ जैसा बर्ताव होता है, उसमें अक्सर कानूनी तकाजों को भी ताक पर रख दिया जाता है। लालगंज इलाके में मोटरसाइकिल चोरी में शामिल एक गिरोह से कथित संबंध रखने के आरोप में एक दलित युवक को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। लेकिन आरोपों के मुताबिक हिरासत में पुलिस ने उसे भयानक यातनाएं दीं, जिसके चलते रविवार की सुबह उसकी मौत हो गई।

स्थानीय लोगों के विरोध प्रदर्शन और दबाव के बाद पुलिस की यह सफाई भी विचित्र है कि युवक को कोरोना वायरस के संक्रमण के लक्षण थे। सवाल है कि किसी भी स्थिति में युवक के साथ क्या वैसा बर्ताव होना चाहिए था, जैसे आरोप हैं? लोगों के बीच फैलते आक्रोश के मद्देनजर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने थाना प्रभारी को निलंबित कर दिया, लेकिन कार्रवाई के नाम पर ऐसी औपचारिकताएं क्या इस तरह की समस्या का कोई हल दे सकती हैं?

यह कोई छिपी बात नहीं है कि पुलिस जब किसी आरोपी को हिरासत में लेती है या फिर गिरफ्तार करती है तो पूछताछ करने या उससे जानकारी निकलवाने के नाम पर किस तरह का बर्ताव किया गया जाता है। अव्वल तो दोषी साबित होने के पहले तक कोई व्यक्ति आरोपी होता है और उसके साथ पूछताछ से लेकर पुलिस के व्यवहार के लिए कुछ मानक निर्धारित किए गए हैं। सवाल है कि क्या उन मानकों में आरोपी या संदिग्ध को यातना देकर पूछताछ करने की भी व्यवस्था शामिल है और क्या वह कानूनी है?

फिर हिरासत में लिए गए हरेक व्यक्ति के साथ पुलिस क्या एक ही पैमाने के साथ पेश आती है? ऐसे आरोप आम हैं कि पुलिस जब किसी आरोप में दलित या कमजोर तबके के व्यक्ति को पकड़ती है तो पूछताछ के नाम पर उसके साथ मारपीट करना या यातना देना ही सबसे अहम रास्ता मानती है। ऐसा क्यों होता है? जबकि हिरासत में लिए गए किसी भी व्यक्ति की सेहत और सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस की होती है। लेकिन गिरफ्तार लोगों के साथ पुलिस के बर्ताव की हकीकत जगजाहिर रही है।

राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के एक आंकड़े के मुताबिक सन 2017 में पुलिस हिरासत में सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। इनमें से अट्ठावन लोग रिमांड पर नहीं थे, यानी उन्हें गिरफ्तार तो किया गया, लेकिन अदालत में पेश नहीं किया गया। क्या यह कहना सही नहीं होगा कि वे अट्ठावन लोग अपने ऊपर लगे आरोपों के साबित हुए बिना ही मर गए और हो सकता है उनमें से कई निर्दोष रहे हों?

ऐसे मामलों में स्पष्ट रूप से पुलिसकर्मियों या अधिकारियों के आरोपी होने के बावजूद उनके खिलाफ शायद ही कोई कार्रवाई होती है या उन्हें सजा मिल पाती है। यह बेवजह नहीं है कि किसी को हिरासत में लेने के बाद पुलिस उसके ऊपर बेरहमी करना अपना अधिकार समझ लेती है।

एक आधुनिक और सभ्य व्यवस्था में बिना यातना दिए आरोपी व्यक्ति से जानकारी निकलवाने के तमाम नए तरीके आजमाए जा सकते हैं, जिसमें जांच के अलग-अलग स्तर, सुराग और सबूत खोजना, मनोविज्ञान से लेकर जानकारी निकालने के लिए नई तकनीक का सहारा लेना शामिल है। लेकिन ऐसा लगता है कि यातना देना ही एकमात्र जरिया समझ लिया जाता है, जबकि इसे पुलिस की एक अक्षमता और अयोग्यता के रूप में देखा जाना चाहिए। जब तक पुलिस के इस तरह के बर्ताव में सुधार नहीं आएगा, तब तक वह कमजोर तबकों या आम जनता की सुरक्षा के लिहाज से अपनी उपयोगिता का दावा नहीं कर सकती!

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