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सीवर में मौत

मजदूरों को लेकर समूची व्यवस्था के स्तर पर उदासीनता क्यों दिखाई देती है।

सीवर में मौत

इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि एक ओर देश और दुनिया में नई और आधुनिक तकनीकों के जरिए सबसे मुश्किल काम को भी आसान बनाने का दावा किया जा रहा है और दूसरी ओर इसी दौर में पुराने तरीके से सीवर की सफाई करने के चलते अक्सर कई लोगों की जान चली जाती है। यह अपने आप में समूचे सरकारी रवैये पर एक तल्ख सवाल है कि क्या इस तरह से होने वाली मौतें सरकार की नजर में कोई अहमियत नहीं रखतीं! यों इस मुद्दे पर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है कि इस काम में लगे मजदूरों को लेकर समूची व्यवस्था के स्तर पर उदासीनता क्यों दिखाई देती है।

समय-समय पर सरकार की ओर से कोई औपचारिक बयान भी आ जाता है कि इस समस्या का समाधान किया जाएगा। मगर हकीकत यह है कि आज भी सीवर में सफाई के दौरान नाहक ही मजदूरों की जान जाने का सिलसिला रुका नहीं है और सरकार सिर्फ आंकड़े बताने की हालत में है। संसद के मानसूत्र सत्र में तमिलनाडु के एक सांसद के सवाल के जवाब में सरकार की ओर से राज्यसभा में बताया गया कि बीते पांच साल के दौरान सीवर की सफाई करते समय तीन सौ तीस मजदूरों की मौत हो गई।

सवाल है कि विज्ञान और तकनीक की ऊंचाई छूने के दावे के दौर में इस तरह की खबरें सरकार और समूचे समाज को क्या परेशान नहीं करतीं? आखिर क्या वजह है कि करीब दस साल पहले ‘मैनुअल स्केवेंजिंग नियोजन प्रतिषेध और पुनर्वास अधिनियम’ में स्पष्ट रूप से ‘हाथ से मैला उठाने के काम’ को परिभाषित करते हुए सख्त नियम-कायदे तय किए गए, मगर उस पर अमल सुनिश्चित करना जरूरी नहीं समझा गया? गौरतलब है कि इस अधिनियम के तहत यह साफ कहा गया है कि कोई भी स्थानीय अधिकारी या अन्य व्यक्ति किसी भी शख्स को सेप्टिक टैंक या सीवर में ‘जोखिम भरी सफाई’ करने का काम नहीं दे सकता है।

यानी सभी स्थानीय प्राधिकरणों को इस तरह से काम कराने की व्यवस्था को खत्म करने के लक्ष्य से सेप्टिक टैंकों और सीवर की सफाई के लिए आधुनिक तकनीकों को अपनाना होगा। साथ ही कोई भी सरकारी महकमा या स्वतंत्र ठेकेदार सीवर और सेप्टिक टैंक को साफ कराने के लिए हर मजदूर को सुरक्षा उपकरण मुहैया कराएगा। बिना सुरक्षा उपकरण के सफाई पर पूरी तरह पाबंदी है।

मगर हकीकत यह है कि किसी भी शहर या महानगर में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई करते मजदूरों को देखा जा सकता है। वे सुरक्षा उपकरणों के बिना सीवर में उतरते हैं और अक्सर जहरीली गैस की चपेट में आकर दम घुटने से उनकी जान चली जाती है। हैरानी यह है कि कोई प्राधिकरण या ठेकेदार सफाई मजदूरों को सीवर और सेप्टिक टैंक में यह जानते-बूझते हुए भी उतार देता है कि उसमें उसकी जान भी जा सकती है। सफाईकर्मियों की यह मजबूरी ही होती है कि उन्हें महज जीवन चलाने के लिए इस तरह के जोखिम में काम करना पड़ता है।

जाहिर है, यह अमानवीय हालात में काम करने वालों के पुनर्वास से लेकर उनके प्रति संवेदनहीनता की व्यवस्थागत प्रवृत्ति से जुड़ी समस्या है, जिसे लेकर सरकार को तत्काल ठोस पहल करना जरूरी नहीं लगता। क्या ऐसा इसलिए है कि ऐसे काम में लगे मजदूर समाज के बेहद गरीब और हाशिये के तबके से आते हैं? कायदे से सीवर में मौत की हर घटना सरकारों के लिए शर्मिंदगी की वजह बननी चाहिए जो अक्सर धरती से लेकर अंतरिक्ष तक में नए वैज्ञानिक प्रयोगों का हवाला देती रहती हैं और आधुनिकतम तकनीकों के जरिए जनता की जिंदगी को ज्यादा सुविधाजनक बनाने का दावा करती हैं!

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