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संपादकीय: जहरीली हवा

हर साल आने वाली देशी-विदेशी रिपोर्टेंं बता रही हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा हवा भारत के शहरों की खराब है और यह स्थिति दिनोंदिन गंभीर होती जा रही है।

दिल्ली समेत उत्तर भारत कई शहरों में पराली जलाने से वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है।

खेतों में पराली जलाए जाने की समस्या से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए अपने ही पूर्व न्यायाधीश एमबी लोकुर की अध्यक्षता में समिति बना दी है। यह समिति कड़े निगरानी तंत्र के रूप में काम करेगी। राजधानी दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों की हवा जिस कदर जहरीली हो रही है, उसे देखते हुए कड़े कदम उठाना अपरिहार्य हो गया है। पिछले कई सालों से सिर्फ दिल्ली और आसपास के इलाके ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत के ज्यादातर राज्य वायु प्रदूषण की मार झेल रहे हैं।

हर साल आने वाली देशी-विदेशी रिपोर्टेंं बता रही हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा हवा भारत के शहरों की खराब है और यह स्थिति दिनोंदिन गंभीर होती जा रही है। इस बार भी हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के खेतों में पराली जलाई जा रही है और उसका धुआं राजधानी में वायु प्रदूषण का कारण बन रहा है।

यह अफसोसजनक है कि पिछले कुछ वर्षों में सर्वोच्च अदालत के हस्तक्षेप और कड़े निर्देंशों के बावजूद पराली का जलना रुका नहीं है। पंजाब, हरियाणा सहित उन सभी राज्यों को जहां हर साल किसान पराली जलाते हैं, सुप्रीम कोर्ट सख्त निर्देश और कार्रवाई की चेतावनी देता रहा है। अदालत के डर और दबाव में कुछ कदम उठाए भी गए, लेकिन एक सीमा के बाद सरकारों ने भी हाथ खड़े कर दिए।

सर्वोच्च अदालत ने राज्यों के मुख्य सचिवों को निर्देश दिया है कि किसी भी सूरत में किसानों को पराली जलाने से रोका जाए और लोकुर समिति के काम में हर तरह से मदद की जाए। लेकिन सवाल है कि क्या सिर्फ अदालती सख्ती से किसानों को पराली को जलाने से रोक पाना संभव है! अगर ऐसा है तो इस बार पराली जलनी ही नहीं चाहिए थी। दरअसल, समस्या राज्य सरकारों की है। जो कदम सरकारों को उठाने चाहिए, उनमें वे नाकाम रहीं हैं। अगर किसानों के पास पराली जलाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है तो यह सरकारों की जिम्मेदारी बनती है कि पराली निपटान के उपायों पर तेजी से काम करें और उन पर सख्ती से अमल हो।

हालांकि पराली से खाद और बिजली बनाने से लेकर उसके कई तरह के उपयोग करने की बात सामने आती रही है, लेकिन हालात बता रहे हैं कि व्यावहारिक धरातल पर ये उपाय कारगर साबित नहीं हो रहे और समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है।

कहा जा रहा है कि वायु प्रदूषण में पराली जलाने से निकलने वाले धुएं की हिस्सेदारी चार फीसद है। हालांकि यह समय के हिसाब से घटती-बढ़ती रहती है और चार से चालीस फीसद तक रहने की बात है। पर यहां सवाल चार या चालीस फीसद का नहीं होना चाहिए। मुद्दा यह है पराली जलाने पर किसी भी कीमत पर रोक लगनी चाहिए। वरना सर्वोच्च अदालत के आदेशों का क्या मतलब रह जाएगा? यह भी सच है कि राजधानी और इसके आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच जाने का एकमात्र कारण पराली नहीं है, कई और भी कारण हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया सकता।

इनमें वाहनों से निकलने वाला धुआं, जगह-जगह कचरा जलाना, निर्माण कार्यों से उड़ती धूल, छोटी फैक्ट्रियां आदि ऐसे कारण हैं जो हवा को निरतंर खराब कर रहे हैं। हालांकि दिल्ली सरकार ने इस बार कई निकायों पर भारी जुर्माना लगा कर सख्ती का संदेश दिया है, लेकिन इतनी ही सख्ती दूसरे कारणों के समाधान में भी दिखनी चाहिए। तमाम कड़े उपायों के बावजूद दिल्ली की सड़कों पर लाखों दुपहिया और चार पहिया वाहन दौड़ रहे हैं, जिनकी अवधि पूरी हो चुकी है। ऐसे में कैसे हवा को साफ रख पाएंगे?

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