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सदन में हिंसा

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में गुरुवार को जो हुआ, राज्य के अनेक राजनीतिक दलों ने स्वाभाविक ही उसे निंदनीय ठहराया है।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में गुरुवार को जो हुआ, राज्य के अनेक राजनीतिक दलों ने स्वाभाविक ही उसे निंदनीय ठहराया है। हुआ यह कि निर्दलीय विधायक इंजीनियर राशिद की भाजपा विधायकों ने पिटाई कर दी। भाजपा के एक विधायक ने सबके सामने राशिद को थप्पड़ मारा। भाजपा विधायक इस बात से नाराज थे कि राशिद ने बीफ पार्टी का आयोजन किया था। सदन में राशिद पर हुए हमले की मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला समेत राज्य के अनेक राजनीतिकों ने निंदा की है। उपमुख्यमंत्री और भाजपा विधायक दल के नेता निर्मल सिंह भी अपनी पार्टी के विधायकों के किए का बचाव नहीं कर सके। इसमें दो राय नहीं कि भाजपा विधायकों ने जो किया उससे विधानसभा की गरिमा तार-तार हुई है।

सदन बहस और जन सरोकार के मसले उठाने का मंच है, न कि बाहुबल के प्रदर्शन का। अगर इसे हिंसा का अखाड़ा बना दिया जाएगा, तो हमारे संसदीय लोकतंत्र का क्या होगा? अगर एक विधायक सदन में सुरक्षित नहीं है, तो शायद कोई भी जगह सुरक्षित नहीं है। पर इसी के साथ यह भी कहना होगा कि इंजीनियर राशिद का व्यवहार उकसाने वाला था। उन्होंने विधायक निवास परिसर में बीफ पार्टी आयोजित की। उनका कहना है कि वे इस बात पर जोर देना चाहते थे कि कोई कुछ भी खाए-पिए, यह उसका अधिकार है। लेकिन इस अधिकार को जताने का यही तरीका उन्होंने क्यों चुना? विधायक निवास परिसर में हुआ आयोजन और सदन में हुई हिंसा, ये दोनों घटनाएं अतिवाद और नफरत की राजनीति की उपज हैं। यह हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

निश्चित ही लोकतंत्र में मतभेद, असहमति और विरोध का स्थान है, पर यह भी जरूरी है कि इन्हें मर्यादित ढंग से जाहिर किया जाए। जब किसी खास मसले पर पहले से तनाव का माहौल हो, तब तो यह और भी जरूरी है। दादरी कांड पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी चिंता जता चुके हैं। पर जम्मू-कश्मीर में उसके पहले से, हाइकोर्ट के एक फैसले को लेकर विवाद चल रहा था। हाइकोर्ट ने गोमांस पर प्रतिबंध के पक्ष में और उसे सख्ती से लागू करने का आदेश दिया था। मगर पांच दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी। मामले के सभी पहलुओं पर विचार करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने एक बृहत्तर पीठ गठित करने का फैसला किया है। जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों को प्रस्तावित पीठ के फैसले का इंतजार करना चाहिए।

पर इस राज्य की राजनीति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह धार्मिक आधार पर भी विभाजित है और क्षेत्रीय आधार पर भी। भाजपा की नजर जहां जम्मू के अपने परंपरागत आधार पर है, वहीं पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस का रुख घाटी के मिजाज से तय होता है। इस वक्त राज्य में भाजपा और पीडीपी की साझा सरकार है। इन दोनों दलों के गठबंधन में कोई वैचारिक साम्य खोजना मुश्किल है, इसलिए स्वाभाविक ही इसे मजबूरी के गठजोड़ और ‘विरोधों के सामंजस्य’ के तौर पर देखा गया। विसंगति के बरक्स यह उम्मीद भी की गई कि यह गठबंधन जम्मू और घाटी के बीच सौहार्द के पुल का काम करेगा। पर एक बार फिर निराशा हुई है।

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