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संपादकीयः आतंक के तार

छब्बीस नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकवादी हमले की साजिश रचने वाले कौन थे, किन्होंने उसे अंजाम दिया और किन्होंने उसमें मदद की, यह सब कोई रहस्य नहीं था।

Author February 10, 2016 3:17 AM
26.11.2008 हमले की एक फाइल फोटो

छब्बीस नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकवादी हमले की साजिश रचने वाले कौन थे, किन्होंने उसे अंजाम दिया और किन्होंने उसमें मदद की, यह सब कोई रहस्य नहीं था। यह भारत पर हुआ सबसे बड़ा आतंकवादी हमला था और हर तरह से इसकी विस्तृत जांच चली। लिहाजा, हमले के पीछे लश्कर-ए-तैयबा का हाथ होने, हमले की योजना पाकिस्तान में बनने और उसमें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के मददगार होने के तथ्य पहले से ही मालूम थे। डेविड हेडली की गवाही से लाभ यह हुआ है कि उन तथ्यों की फिर से पुष्टि हुई है। फिर, यह गवाही ऐसे व्यक्ति की है जो उस हमले की तैयारी में शामिल था।

वह इलाके और रास्तों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के इरादे से कई बार भारत आया था। डेविड हेडली पाकिस्तानी मूल का अमेरिकी नागरिक है और शिकागो की जेल में पैंतीस साल की सजा भुगत रहा है। वह पहला विदेशी आतंकवादी है जिसकी गवाही भारत की एक अदालत में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई। यह इस बात का उदाहरण है कि अगर प्रत्यर्पण न हो सके, तब भी न्यायिक कार्यवाही संभव है। मुंबई कांड के मामले में भारत सरकार ने पिछले साल दिसंबर में हेडली को सरकारी गवाह बनने की इजाजत दे दी। हेडली इसके लिए तैयार हो गया, इस आश्वासन पर कि वायदा माफ गवाह बनने की सूरत में भारत उसके प्रत्यर्पण की मांग नहीं करेगा। उसकी गवाही ने पाकिस्तान को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। उसने बताया कि उसे और अन्य आतंकियों को प्रशिक्षित और निर्देशित करने में लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद और कमांडर जखीउर्रहमान लखवी की अहम भूमिका थी। इस सब में आईएसआई के कुछ अफसर भी शामिल थे। हेडली ने उनके नाम भी उजागर किए हैं। 26/11 के मामले में यह कोई नया मोड़ नहीं है। हां, इस सिलसिले में भारत का पक्ष और मजबूत हुआ है। दूसरी तरफ पाकिस्तान की परेशानी बढ़ी है।

सीरिया व इराक के कुछ हिस्सों पर आईएस के कब्जे और पेरिस में हुए आतंकी हमले के बाद आतंकवाद को लेकर पहले से कहीं अधिक चिंताजनक माहौल है, और इसका फायदा उठा कर भारत ताजा खुलासे का इस्तेमाल पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने के लिए कर सकता है। अलबत्ता ऐसी कोशिश हो, तो किस हद तक रंग लाएगी, निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। क्योंकि तमाम सबूत सौंपने के बाद हर बार भारत को निराश होना पड़ा है। पठानकोट मामले में जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर का हाथ होने के भारत के सबूतों को पाकिस्तान ने खारिज कर दिया है।

जखीउर्रहमान लखवी और हाफिज सईद की बाबत भी उसने यही सलूक किया है। आतंकी घटनाओं को लेकर जब भी पाकिस्तान की जवाबदेही का सवाल उठा है, उसका जवाब रहा है कि घटना गैर-राजकीय तत्त्वों ने अंजाम दी है जिनके लिए वह जवाबदेह नहीं है। पर आईएसआई तो पाकिस्तानी फौज की खुफिया एजेंसी है। दरअसल, मुंबई हमले के सिलसिले में आईएसआई के कुछ अफसरों ने जो किया होगा उसे आतंकवाद का रणनीतिक इस्तेमाल करने के पाकिस्तान के प्रच्छन्न पर सोची-समझे रवैए से अलग करके नहीं देखा जा सकता। आतंकी गुटों को कश्मीर में अपनी सक्रियता बढ़ाने की खातिर मदद करने की स्वीकारोक्तिकुछ महीने पहले मुशर्रफ ने की थी। अलबत्ता हाल में पाकिस्तान की एक संसदीय समिति ने आह्वान किया है कि आतंकवाद का रणनीतिक इस्तेमाल करने की नीति छोड़ दी जाए। क्या पाकिस्तानी नेतृत्व अपनों के ही बीच से आए इस सुझाव पर अमल करने की इच्छाशक्ति दिखा पाएगा!

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