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खुलासे के मायने

पिछले दिनों नवाज शरीफ सरकार ने दहशतगर्दी की कई साजिशों के बारे में समय रहते भारत को आगाह किया।

Author नई दिल्ली | March 28, 2016 12:04 AM
David Headley 26/11 Mumbai Attack, Mumbai Attack, 26/11 Mumbai Attack, Mumbai Attack 26/11, Mumbai 26/11 Attack, Mumbaiआतंकी डेविड हेडली।

नवंबर 2008 का मुंबई कांड देश पर हुआ सबसे बड़ा आतंकी हमला था। इसकी हर कोण से विस्तृत जांच हुई थी। फिर कसाब के रूप में एक हमलावर जिंदा पकड़ा गया था। तमाम जांच और सबूतों से इसमें कोई शक नहीं रह गया था कि हमले की योजना पाकिस्तान में बनी और इसे लश्कर-ए-तैयबा ने अंजाम दिया था। इसलिए जब डेविड हेडली ने पिछले महीने की अपनी गवाही में मुंबई कांड के पीछे लश्कर का हाथ होने तथा हमलावरों को हाफिज सईद व जखीउर्रहमान लखवी द्वारा प्रशिक्षित और निर्देशत होने की बात कही, तो शायद ही किसी को आश्चर्य हुआ हो। अलबत्ता इससे भारत की जांच और पुख्ता हुई तथा मुंबई मामले में उसका पक्ष और मजबूत हुआ। पर डेविड हेडली की गवाही एक दूसरे कोण से ज्यादा मायने रखती है। मुंबई कांड समेत आतंकवाद के मामलों के मद्देनजर जब भी पाकिस्तान की जवाबदेही की बात उठी है, उसकी दलील रही है कि इस सब में गैर-राजकीय तत्त्वों का हाथ था, जो उसकी नुमाइंदगी नहीं करते। लेकिन हेडली की गवाही ने पाकिस्तान की इस बहानेबाजी को भी बेपर्दा कर दिया है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपनी ताजा गवाही में उसने एक चौंकाने वाला बयान दिया है। उसने कहा है कि मुंबई हमले के कुछ ही हफ्तों बाद पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी उसके घर आए थे, उसके पिता की मौत पर गम जाहिर करने। अलबत्ता इस बयान से यह साफ नहीं होता कि हेडली के परिवार से गिलानी की करीबी की क्या वजह थी। पर यह शक जरूर पैदा हुआ है कि गिलानी की नजर में उस परिवार की अहमियत कहीं हेडली के कारण तो नहीं थी? इससे पहले, फरवरी में अपनी गवाही में हेडली ने आईएसआई के कुछ अफसरों के भी नाम लिये थे जिन्होंने मुंबई हमले की योजना बनाने में मदद की थी। इस सब से मुंबई हमले को केवल गैर-राजकीय तत्त्वों की कारस्तानी बताने की पाकिस्तानी दलील की हवा निकल जाती है।

यह भी सनद रहे कि कुछ महीने पहले पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने कबूल किया था कि कश्मीर में आतंकी गुटों को अपनी सक्रियता बढ़ाने के लिए उन्होंने मदद की थी। विडंबना यह है कि ऐसे रिकॉर्ड के बावजूद पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गठबंधन का हिस्सेदार होने का दम भरता रहा है। और भी विचित्र यह है कि कई बार उसकी इस दलील पर निहायत भोलेपन से भरोसा करके या उसकी आड़ लेकर अमेरिका उसे सैनिक साजो-सामान, यहां तक परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम लड़ाकू विमान बेचने में संकोच नहीं करता। लिहाजा, पाकिस्तान तो कठघरे में है ही, उसके प्रति सख्त रुख अख्तियार न करने के कारण अमेरिका समेत पश्चिमी देशों के रवैये पर भी सवाल उठते हैं। इराक तथा सीरिया के कुछ हिस्सों पर आईएस के कब्जे तथा पेरिस और अब बेल्जियम में हुए आतंकी हमले के कारण आतंकवाद को लेकर दुनिया खासकर पश्चिमी देश आज पहले से कहीं अधिक चिंतित हैं। लिहाजा, उन्हें हेडली के खुलासे और मुशर्रफ की स्वीकारोक्ति को लेकर भी फिक्रमंद होना चाहिए। राहत की बात कुछ है तो बस यह कि हाल में खुद पाकिस्तान की एक संसदीय समिति ने आह्वान किया कि उनके देश को आतंकवाद का रणनीतिक इस्तेमाल करने का लोभ छोड़ देना चाहिए। पिछले दिनों नवाज शरीफ सरकार ने दहशतगर्दी की कई साजिशों के बारे में समय रहते भारत को आगाह किया। क्या यह उम्मीद की जाए कि इस रुख में निरंतरता बनी रहेगी!

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