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जड़ता का जहर

परंपराओं की जड़ता हमारे सामाजिक विकास के रास्ते में इस कदर एक बाधक तत्त्व बन कर सामने खड़ी है कि एक पिता सिर्फ इस बात के लिए अपनी बेटी और उसके जीवन साथी की हत्या कर दे सकता है कि उन्होंने जातिगत दायरे को तोड़ कर प्रेम और विवाह कर लिया।

Author July 8, 2019 1:26 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

बीते एक हफ्ते के भीतर उत्तर से लेकर दक्षिण भारत के राज्यों से झूठी शान के नाम पर हत्या की चार घटनाएं सामने आर्इं हैं। साफ है कि आधुनिकता और न्याय आधारित समाज बनाने के दावे के बीच महिलाओं को बराबरी और सम्मान की जगह देने के मामले में हम एक समाज और व्यवस्था के रूप में किस कदर नाकाम हुए हैं। तमिलनाडु के थुत्तुकुडी में अंतरजातीय विवाह करने के बाद तीन महीने की गर्भवती युवती और उसके पति की झूठे सम्मान के नाम पर हत्या कर दी गई। इस आरोप में युवती के पिता को गिरफ्तार किया गया है। पिछले हफ्ते ही कोयंबटूर से भी एक दंपती की इसी वजह से हत्या की खबर आई थी। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश के इटावा और जेवर से भी दो दिनों के भीतर दो ऐसी घटनाओं की खबरें सामने आई हैं, जिनमें अपनी मर्जी से प्रेम या फिर विवाह करने की वजह से लड़की को उसके परिवार वालों ने मार डाला। प्रेम और विवाह के मामले में पारंपरिक मान्यताओं से इतर अपनी मर्जी से कदम बढ़ाने को इज्जत जाने के रूप में देखना और इसके लिए अपनी संतानों की हत्या कर देने की ये कोई नई घटनाएं नहीं है। मगर आजादी के सात दशक बाद हो रही ऐसी घटनाएं बताती हैं कि आज भी हमारा समाज किन मध्ययुगीन सामंती मूल्यों को ढो रहा है। इससे यह भी साफ है कि ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ से लेकर स्त्री सशक्तिकरण के तमाम कार्यक्रमों की कामयाबी अभी कितनी दूर है।

परंपराओं की जड़ता हमारे सामाजिक विकास के रास्ते में इस कदर एक बाधक तत्त्व बन कर सामने खड़ी है कि एक पिता सिर्फ इस बात के लिए अपनी बेटी और उसके जीवन साथी की हत्या कर दे सकता है कि उन्होंने जातिगत दायरे को तोड़ कर प्रेम और विवाह कर लिया। ऐसी हत्या करने वाले को न इंसान होने की बुनियादी शर्त को समझना जरूरी लगता है, न उसे कानून का डर सताता है। सवाल है कि आखिर वे कौन-सी वजहें हैं जिनके चलते आज भी बहुत सारे लोग यह समझने के लिए तैयार नहीं हो रहे कि न केवल संवैधानिक व्यवस्था के तहत किसी बालिग युवक या युवती को अपनी पसंद से प्रेम और विवाह का अधिकार है, बल्कि यह एक सभ्य समाज का तकाजा भी है कि किसी वयस्क स्त्री या पुरुष के अपनी जिंदगी के बारे में लिए गए निजी फैसलों का सम्मान किया जाए। माता-पिता या अभिभावक होने के नाते अपने बच्चों का खयाल रखना और उनसे अपने प्रति संवेदना की अपेक्षा करना गलत नहीं है। लेकिन सिर्फ इसी वजह से उनके जीवन को संचालित करने या उन पर कब्जे को अपना अधिकार मानना और इसमें अड़चन आने पर अपने ही बच्चे को मार डालना अपराध और पिछड़ी हुई सामंती सोच का परिचायक है।

विडंबना यह है कि आधुनिकता और विकास के चकाचौंध के नाम पर बाहर से दिखने वाले बदलाव तो चारों तरफ आम हो गए, लेकिन इनके वास्तविक मूल्यों के बारे में समझना जरूरी नहीं समझा गया। हमारा समाज अब तक जिन सामंती मूल्यों के साथ जीता रहा है, उसके साथ अगर केवल दिखावे की आधुनिकता और विकास का घालमेल होता है तो वह शायद ज्यादा घातक होता है। एक ओर जाति की झूठी हैसियत से जुड़ी अमानवीय मानसिकता और दूसरे, बेटी को अपनी इज्जत का पर्याय मान लेना किसी भी समाज के जातिवादी और पुरुष वर्चस्व की मानसिकता में जीने का ही सबूत है। बेटी के अपनी पसंद से प्रेम या विवाह करने पर उसे मार डालना झूठी शान की आड़ में की गई क्रूर हत्या ही है, जिसका कोई भी सभ्य और संवेदनशील समाज विरोध करेगा।

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