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संपादकीः दहशत के ठिकाने

बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स के हवाई अड््डे और एक मेट्रो स्टेशन पर हुए आतंकी हमले ने यूरोप के साथ-साथ दुनिया के तमाम ताकतवर देशों को एक बार फिर चुनौती दी है।

Author March 24, 2016 4:14 AM
बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स का हवाई अड्डा

बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स के हवाई अड्डे और एक मेट्रो स्टेशन पर हुए आतंकी हमले ने यूरोप के साथ-साथ दुनिया के तमाम ताकतवर देशों को एक बार फिर चुनौती दी है। इसे पेरिस हमले की दूसरी कड़ी माना जा रहा है। इस हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट यानी आइएस ने ली है। कहा जा रहा है कि पेरिस हमले के आरोपी सालेह अब्दे सलाम की गिरफ्तारी की प्रतिक्रिया में उसने ब्रसेल्स हमले को अंजाम दिया है। ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ का मुख्यालय भी है। इस तरह यह हमला एक तरह से पूरे पश्चिमी देशों को चुनौती है। पेरिस हमले के बाद अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि देशों ने आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का आह्वान किया था।

मगर ब्रसेल्स पर हमला करके आइएस ने साबित कर दिया है कि आतंकवाद से निपटने के लिए जिस तरह की सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत है, वह अभी तक नहीं हो सकी है। कहा जा रहा है कि सीरिया और ईरान में मिल रही विफलता की वजह से हताश आइएस ने यूरोपीय देशों में अपना जाल फैलाना शुरू कर दिया है। वहां इस्लाम को मानने वाले युवकों को आकर्षित करना और जिहाद के रास्ते पर ला खड़ा करना उसके लिए आसान है। इसलिए अब यह भी आशंका बढ़ती गई है कि पश्चिमी देशों में इस्लाम को मानने वालों के खिलाफ नफरत के सुर कुछ तेज हो सकते हैं। अमेरिका में आतंकवाद से निपटने के नाम पर जिस तरह पूरे मुसलिम समुदाय को शक की नजर से देखा जाने लगा है, वह प्रवृत्ति सारे यूरोपीय देशों में न फैल जाए। इसलिए ब्रसेल्स हमले के बाद सुरक्षा उपायों के मामले में संयम से काम लेने की दरकार महसूस की जा रही है।

आइएस की बढ़ती ताकत से न सिर्फ यूरोपीय देशों के माथे पर शिकन पैदा कर दी है, बल्कि भारत जैसे देशों के लिए भी चुनौती पैदा हो गई है। पेरिस हमले के बाद यहां के गृहमंत्रालय ने कहा था कि आइएस को यहां किसी भी रूप में अपने पांव नहीं पसारने दिया जाएगा। मगर सवाल है कि क्या इसके लिए माकूल सुरक्षा इंतजाम हैं। हैरानी की बात है कि आइएस कैसे ब्रसेल्स के हवाई अड््डे की सुरक्षा व्यवस्था को भेद कर धमाके करने में कामयाब रहा! इसमें सुरक्षा संबंधी खामियों पर विचार करने की जरूरत न सिर्फ बेल्जियम सहित तमाम यूरोपीय देशों को है, बल्कि भारत जैसे देशों को भी इससे सबक लेना चाहिए।

फिर आइएस की आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। यह बात छिपी नहीं है कि दुनिया के सारे देश आतंकवाद की निंदा तो करते हैं, पर आइएस की हरकतों पर सभी एकजुट नहीं हैं। जब तक इसके लिए सारे राजनीतिक मतभेदों को भुला कर एकजुटता नहीं दिखाई जाती, इस चुनौती से पार पाना आसान नहीं होगा। इसके लिए इस्लामिक नेताओं को भी आगे लाने की जरूरत है, ताकि वे जिहाद के नाम पर चल रहे खून-खराबे की निंदा करें। इससे आइएस की तरफ आकर्षित होने वाले युवाओं को सही रास्ते पर चलने को प्रेरित किया जा सकता है। अगर ऐसा नहीं होगा तो इस्लाम को मानने वालों के प्रति शक और नफरत में बढ़ेंगे ही और यह किसी भी रूप में मानव समाज के लिए हितकर नहीं होगा। आइएस के संजाल को सिर्फ हथियारों के बल पर खत्म करने का दावा नहीं किया जा सकता, इसके लिए सामाजिक स्तर पर भी काम करने की जरूरत है।

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