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दागियों पर अंकुश

राजनीति के अपराधीकरण के मसले पर लगभग सभी दलों के बीच ऊपरी तौर पर यह आम सहमति दिखती है कि दागी छवि वाले लोगों को चुनावों में उम्मीदवार नहीं बनाया जाए।

राजनीति के अपराधीकरण के मसले पर लगभग सभी दलों के बीच ऊपरी तौर पर यह आम सहमति दिखती है कि दागी छवि वाले लोगों को चुनावों में उम्मीदवार नहीं बनाया जाए। लेकिन इस चिंता के बरक्स हकीकत यह है कि ऐसी पार्टियां उंगलियों पर गिनी जाने लायक हैं जो इस विचार पर कुछ हद तक अमल करती दिखती हैं। व्यवहार में ज्यादातर बड़ी पार्टियां कानून के किसी कोण का लाभ उठा कर चुनावों में ऐसे व्यक्ति को भी उम्मीदवार बनाने से नहीं हिचकतीं, जो या तो फितरतन अपराधी रहे हों या उनके गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त रहने की पृष्ठभूमि हो।

हालांकि समय-समय पर चुनाव आयोग से लेकर अदालतों तक की ओर से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों से चुनावी प्रक्रिया और लोकतंत्र को मुक्त करने के लिए सख्त कानून बनाने की बातें होती रही हैं। लेकिन अब तक दागियों के राजनीति में दखल की रोकथाम की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो सकी है। यह बेवजह नहीं है कि आज भी संसद और राज्यों की विधानसभाओं में बड़ी तादाद में ऐसे लोग जनप्रतिनिधि के रूप में मौजूद हैं, जिन पर कई आपराधिक मुकदमे दर्ज रहे।

सवाल है कि भारत में चुनावी लोकतंत्र के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में मौजूद होने के बावजूद इस समस्या को लेकर देश के राजनीतिक हलके में कोई चिंता क्यों नहीं दिखाई देती है। आखिर क्या वजह है कि आज भी आम नागरिकों को इस मामले में राजनीतिक दलों से कोई खास उम्मीद नहीं है और राजनीति को आपराधिक छवि के लोगों से मुक्त करने के लिए उन्हें अदालत का रुख करना पड़ रहा है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर चुनाव को उन राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने का निर्देश देने की मांग की गई है, जो अपने उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों के बारे में ब्योरा सार्वजनिक करने और अपने आधिकारिक वेबसाइट पर उसे प्रकाशित करने में विफल रहते हैं।

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक इतिहास के प्रकाशन से संबंधित निर्देशों के उल्लंघन के लिए अदालत की अवमानना के लिए आठ राजनीतिक दलों को दोषी ठहराया था। अदालत ने राजनीति के अपराधीकरण की ‘खतरनाक’ वृद्धि को ध्यान में रखते हुए को ध्यान में रखते हुए सभी राजनीतिक दलों को लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अपने उम्मीदवारों के आपराधिक इतिहास का विवरण उम्मीदवार के चयन के अड़तालीस घंटे के भीतर नामांकन के दो सप्ताह के भीतर, जो भी पहले हो, प्रकाशित करने का निर्देश दिया था।

सवाल है कि राजनीति में अक्सर शुचिता और नैतिकता की बात करने में सबसे आगे रहने वाली पार्टियां आखिर अपनी ओर से इसके लिए ठोस और स्पष्ट कदम उठाने के बजाय अमूमन हर मौके पर उम्मीदवारों के चयन को लेकर खुद इसके उलट फैसले लेती क्यों दिखती हैं! चुनाव आयोग से लेकर अदालतों तक में लंबे समय से दागी उम्मीदवारों के जनप्रतिनिधि के रूप में संसद और विधानसभाओं में चुन कर आने के मसले पर चिंता जताई जाती रही है।

मगर वे कौन-सी परिस्थितियां और कानून की कसौटी पर कमजोर बिंदु हैं, जो देश में राजनीतिक दलों को दागी लोगों को अपना उम्मीदवार बनाने से नहीं रोक पाती हैं? आज भी अगर जनता की नुमाइंदगी करने वालों में खासी संख्या हत्या, बलात्कार, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध में शामिल रहे दागी पृष्ठभूमि वाले नेताओं की देखी जाती है, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? मतदाताओं से उम्मीद की जाती है कि वे आपराधिक छवि वाले नेता को वोट न दें। लेकिन शायद इस दिशा में अभी लोगंों के बीच लोकतंत्र और उसके मूल्यों को लेकर सशक्तिकरण की प्रक्रिया को और मजबूत करने की जरूरत है।

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